Wednesday, October 14, 2026
बुद्धकालीन पारिवारिक संरचना और स्त्री
आदर्श रूप में माता-पिता की इच्छा होती थी कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जो परिवार के दायित्वों-कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए एवं वंश-वृक्ष को आगे बढ़ाते हुए अपने पुत्र को संपत्ति का अधिकार सौंपे। (दीघनिकाय, पृष्ठ 189) व्यवहार में भी हम पाते हैं कि माता-पिता पुत्र से अधिक प्रेम रखते हैं। अपने पुत्र के निधन पर एक गहपति इतना शोकाकुल होता है कि भोजन, व्यवसाय आदि को छोड़ बेटे की कब्र पर विलाप करता रहता है। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 106)
जब रथपाल ने अपने पिता से संघ में प्रवेश पाने की अनुमति चाही तो उसके पिता ने समझाया, ‘तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो। तुमने अब तक भोग-विलास का जीवन गुजारा है तथा तुम्हें दुखों का अंदाजा नहीं है। जीते जी मैं तुम्हें मरने के लिए भला कैसे छोड़ सकता हूं ?’ (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 56-57) रथपाल के पिता के आग्रह पर उसके दोस्त भी उसे समझाने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन मना नहीं पाते। अंत में रथपाल के पिता ने उसे भिक्षु बनने की अनुमति इस शर्त पर दी कि वह उनसे मिलने आता रहेगा। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 60) सुदिन्न कलन्दक भी जब भिक्षु बनने की बात करता है तो उसके पिता भी यही सब बात कह समझाते हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 13-14) यस ने जब गुप्त तरीके से गृहत्याग किया तो सबसे पहले उसकी माता को इसका भान हुआ। उसके पिता को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी माता शोकाकुल हो विलाप करती हैं। अपनी माता को जीवन वापस कर दो।’ (विनयपिटक, पृष्ठ 17)
अंगुत्तर निकाय में कहा गया है कि एक माता अपने पुत्र को वृद्ध होते नहीं देख सकती। एक माता कहती है, ‘मैं बूढ़ी हो रही हूं, लेकिन मेरा पुत्र वृद्ध न हो।’ (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 179) बुद्ध के गृहत्याग के समय उनके माता-पिता आंखों में आंसू भर विलाप करते हैं। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 166; दीघनिकाय, पृष्ठ 115) पिता बुद्ध से आग्रह करते हैं कि वे नियम बनाएं कि माता-पिता की अनुमति के बगैर कोई संतान संघ में प्रवेश न करने पाये। वे अपने दुख का बखान करते कहते हैं, ‘तुम्हारे जाने से काफी गहरा दुख हुआ। नंदा के जाने से भी ठीक ऐसा ही प्रतीत हुआ लेकिन राहुल के जाने से जो पीड़ा उत्पन्न हुई है वह असह्य है। पुत्र के लिए प्यार मन में गहरे बैठ गया है। इसकी वेदना हड्डियों में प्रवेश कर छेद डालती है।’ (विनयपिटक, पृष्ठ 82-83)
पुत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पारिवारिक दायित्व वंश-वृक्ष को आगे बढ़ाना है। सुदिन्न कलन्दक को हम इस बात के प्रति काफी सजग पाते हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 18) साथ ही बुद्ध की इस बात के लिए भर्त्सना की गई है कि उन्होंने कई परिवारों को पुत्रहीन बनाते हुए नष्ट कर डाला। (विनयपिटक, पृष्ठ 43)
सत्ता एवं संपत्ति का अधिकार पिता से पुत्र को प्राप्त होता है। गद्दी प्राप्त करने के लिए अजातशत्रु को अपने पिता बिंबिसार की हत्या करनी पड़ी। (दीघनिकाय, पृष्ठ 85) उत्तराधिकार पिता-पुत्र के बीच के संबंध का एक आधारभूत पहलू है। माता-पिता दोनों ही की संपत्ति पुत्र को मिलती है; पुत्र के अभाव में यह निकट संबंधी अथवा राज्य के द्वारा हस्तगत कर ली जाती है। सुदिन्न कलन्दक जब भिक्षु होना चाहता है तो उसकी मां संपत्ति की रक्षा हेतु उससे पुत्र देने का आग्रह करती है। वह तर्क देती है कि पुत्र के अभाव में संपत्ति राज्य के द्वारा हथिया ली जाएगी। (विनयपिटक, पृष्ठ 18) राहुल जब अपने पिता का अनुगमन करता है तो सुद्धोदन इस बात से दुखी होते हैं कि अब उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा। एक पुत्रहीन गहपति की संपत्ति राजा पसेनदि द्वारा हथिया ली जाती है। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 89-90) उत्तराधिकारी के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए बुद्ध कहते हैं कि पुत्रहीन गहपति ने अपने पूर्वजन्म में अपने भाई के एकमात्र पुत्र की हत्या संपत्ति हेतु कर डाली थी। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 92) पैतृक संपत्ति का सभी बेटों में समान विभाजन कर दिया जाता था। एक ब्राह्मण अपनी दो पत्नियों के बीच एक पुत्र को छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हो गया। बेटा अपने पिता की दूसरी पत्नी से कहता है कि जो भी पिता का था उस पर एकमात्र उसका अधिकार है। जवाब में वह कहती है, ‘मेरे प्रसव का इंतजार करो। अगर पुत्र हुआ तो वह भी अपने पिता की संपत्ति में आधे का मालिक होगा और अगर पुत्री हुई तो वह तुम्हारी सेवा-टहल करेगी।’ (दीघनिकाय, पृष्ठ 331) ऐसा प्रतीत होता है कि पत्नी एवं पुत्री दोनों ही संपत्ति के अधिकार से वंचित थी। इसलिए राजा पसेनदि का पुत्र की बजाए पुत्री के जन्म पर दुखी होना स्वाभाविक जान पड़ता है। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 86)
बेटियां माता-पिता की जवाबदेही हैं। बेटों के समान बेटियों के लिए भी जरूरी था कि भिक्षुणी बनने से पूर्व उन्हें माता-पिता की अनुमति प्राप्त हो। (विनयपिटक, पृष्ठ 334-335) बेटियां माता-पिता द्वारा रक्षित हैं-मातु रक्खिता, पितु रक्खिता तथा मातापितरो रक्खिता।' (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 264) उचित वय को प्राप्त होने पर उनकी शादी कर नये घर भेज दी जाती थी। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 265) यदाकदा विधवाएं अपने माता-पिता के घर रहने वापस लौट आती हैं। गरीब भारद्वाज ब्राह्मण पर सात बेटियों का भार है। उसकी सातों बेटियां एक-दो संतान के साथ विधवा हैं। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 171)
माता का अपनी बेटी के साथ गहरा लगाव देखने को मिलता है। काणा के मातृगृह (मातुघर) जाने की चर्चा है न कि पितृगृह। (विनयपिटक, पृष्ठ 79) विनयपिटक में भी एक स्त्री अपने पति से झगड़कर माता ही के घर जाती है। (विनयपिटक, पृष्ठ 144) यहां तक कि एक वेश्या मां अपनी बेटी के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को समाप्त करने उसके घर जाती है। (विनयपिटक, पृष्ठ 135) यहां माता चूंकि एक वेश्या है इसलिए व न सिर्फ माता की बल्कि पिता की भूमिका का भी निर्वाह करती है।
एक पिता, पुत्री की बजाए पुत्र की कामना करता है और यह भी कि पुत्री को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता। एक पिता की अपनी बेटी के प्रति विचार को बुद्ध द्वारा पसेनदि को सांत्वना देते समय कही गई बातों से स्पष्टतया समझा जा सकता है (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 86) बुद्ध के शब्दों में हम पत्नी एवं पुत्री के आदर्शों की अभिव्यक्ति पाते हैं।
एक स्त्री को हर हाल में अपने माता-पिता को खुश रखना है। बुद्ध का मानना है कि पत्नी को बहन की तरह होना चाहिए अर्थात् छोटी बहन अपनी बड़ी बहन का जिस तरह सम्मान करती है उसी तरह पत्नी को चाहिए कि वह पति की हर ईच्छा की पूर्ति करे। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 93) इसलिए यह स्पष्ट है कि बड़ी बहन का उचित सम्मान था। महाप्रजापति एवं बुद्ध की माता माया दोनों ही सुद्धोदन की पत्नियां थीं। (डिक्शनरी ऑफ पालि प्रॉपर नेम्स, शुद्धोदन,) कहने की जरूरत नहीं कि महाप्रजापति ने बुद्ध का पालन-पोषण माया की बहन बनकर किया। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 276)
बहन के लिए संबोधन का शब्द है भगिनी। बौद्ध भिक्षु प्रायः सभी स्त्रियों के लिए इसी संबोधन का प्रयोग करते हैं। इसलिए बौद्ध भिक्षु का किसी भी स्त्री के साथ यौन-संबंध वर्जित है। भिक्षुओं द्वारा भगिनी शब्द का प्रयोग इस बात को पुष्ट करता है कि भाई-बहन के बीच यौन-संबंध वर्जित माना जाता था। रथपाल, सुदिन्न कलन्दक आदि भिक्षु बनने के पश्चात् अपनी पूर्व-पत्नियों को बहन कहकर संबोधित करते हैं। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 64; विनयपिटक, पृष्ठ 17; और देखें, विनयपिटक,पृष्ठ 263) भिक्षु उदायिन अपनी भिक्षुणी पत्नी को भगिनी कह संबोधित करते हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 205) गहपति उग्ग भी, जो बौद्ध उपासक है, अपनी पत्नियों को भगिनी शब्द से संबोधित करता है। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 210)
भाई-बहन का संबंध वर्जना के सिद्धांत पर आधारित है। (एन.वाग्ले, सोसायटी एट द टाइम ऑफ द बुद्ध, पृष्ठ 178, पा.टि.75) भिक्षुणियां एक-दूसरे को प्रायः ‘अये’ कहकर संबोधित करती हैं जो एक सम्मानसूचक शब्द है। (विनयपिटक, पृष्ठ 332-333) उपासक भी भिक्षुणी को ‘अये’ कहकर संबोधित करते हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 318, 221) दूसरी तरफ भिक्षु सभी स्त्रियों को समान रूप से भगिनी मानते हैं। प्रजापति गौतमी इसकी अपवाद हैं जिन्हें आनन्द गौतमी कहकर संबोधित करते हैं। ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह गौतमी ही थी जिसने महिलाओं को संघ में प्रवेश दिलाया। (विनयपिटक, पृष्ठ 254) दो भिक्षुणी के बीच तथा एक भिक्षुणी एवं एक उपासक के बीच संबंधों की कोई वर्जना नहीं थी किंतु एक भिक्षु एवं एक स्त्री के बीच संबंध की न्यूनतम संभावना थी। एक अवसर पर बुद्ध कहते हैं, ‘एक तलवारधारी पुरुष से बात करना एकांत में एक स्त्री से बात करने से श्रेयस्कर है।’ (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 69) भिक्षु का किसी स्त्री के साथ अल्पतम संबंध का कारण सभी स्त्री को बहन मानना कहा जा सकता है। बुद्ध जब सुजाता (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 93) से सात प्रकार की पत्नियों की चर्चा करते हैं तो उनमें एक कोटि भगिनी-समान पत्नी की भी है।
पत्नी अपने पति को आर्य, आर्यपुत्र, गृहपति, स्वामी आदि संबोधनों से संबोधित करती है। समाज में बहुपत्नी-प्रथा प्रचलित है तथा सह-पत्नी को सपत्नी कहा जाता है। बहुपत्नी विवाह के हमें कई उदाहरण मिलते हैं। महागोविंद ब्राह्मण की चालीस, (दीघनिकाय, पृष्ठ 239, 245) गहपति उग्ग की चार (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 210) तथा रथपाल की कई पत्नियां कही जाती हैं। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 64) नकुलपिता, (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 295-298) मेंडक गहपति, (विनयपिटक, पृष्ठ 240-241) सुप्पिया उपासक, (विनयपिटक, पृष्ठ 216-217) सुदिन्न कलन्दक, (विनयपिटक, पृष्ठ 17) राजा मुण्ड (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 57) एवं राजगृह के सेट्ठी (विनयपिटक, पृष्ठ 272) के उदाहरणों से एकपत्नी विवाह के चलन का प्रमाण प्राप्त होता है। राजा मुण्ड एवं नकुलपिता के मामले में पति-पत्नी के बीच प्रेम-संबंध है। वैसे, एकपत्नी विवाह का संबंध गरीबी से था लेकिन हर मामले के लिए इस तर्क को सही नहीं ठहराया जा सकता। ब्राह्मण की, जिसकी कई विधवा बेटियां थीं, एक ही पत्नी थी। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 170) बुद्ध कहते हैं कि कई पत्नियोंवाले पति की तुलना में एक कुरूप एवं गरीब पत्नी के पति का संघ की ओर आकर्षित होना ज्यादा कठिन है। (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 450-51)
कोई स्पष्ट कारण नहीं है कि क्यों पुरुष दूसरी शादी करते थे। काणा के पति ने दूसरी शादी की क्योंकि उसकी माता उसे अपने पति के पास जाने से रोकती रही। (विनयपिटक, पृष्ठ 78-79)
अगर पति कई पत्नियां रख सकता है तो पत्नी भी पति को त्यागकर पुनर्विवाह कर सकती है। गहपति उग्ग ने अपनी चारों पत्नियों से कहा कि वे अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकती हैं। सबसे बड़ी पत्नी ने एक आदमी को पसंद किया और उग्ग ने उसकी इच्छा पूरी की। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 210) महागोविंद नामक ब्राह्मण पुरोहित भी अपनी चालीस पत्नियों को अपनी पसंद के पुरुष के साथ जाने का अवसर प्रदान करता है। (दीघनिकाय, पृष्ठ 245) नकुल की माता अपने बीमार पति से कहती है कि सोलह सालों तक दाम्पत्य निभाने के बाद अब वह पराए मर्द के साथ नहीं जा सकती। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 296, 61)
पत्नियों के बीच परस्पर ईर्ष्या भी देखी गई। विनयपिटक में एक पति की दो पत्नियों की कहानी है जिनमें से एक संतानहीन है। संतानहीन पत्नी प्रथम पत्नी के अजन्मे बच्चे को दवा एवं बौद्ध भिक्षु की मदद से गर्भ में ही मार डालती है। (विनयपिटक, पृष्ठ 83)
अनिवार्यतया, एक विधवा पुनर्विवाह नहीं करती थी। नकुल की मां अपने पति को ढाढ़स बंधाते कहती है कि ‘संभव है, आप सोचें कि आपके निधन के बाद नकुल की मां अपने बच्चों की परिवरिश में अक्षम साबित होगी लेकिन सूत कातकर मैं अपने बच्चों का लालन-पालन कर सकती हूं।’ (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 296) हम यह भी पाते हैं कि बुद्ध, (विनयपिटक, पृष्ठ 82) सुदिन्न, (विनयपिटक, पृष्ठ 17) रथपाल (मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 64) आदि के भिक्षु बन जाने के बाद उनकी पत्नियां अपने पति के घर ही रहीं। सिर्फ गहपति उग्ग की पत्नियों को अपवाद के रूप में देखा जा सकता है। उग्ग की सामाजिक स्थिति के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि उपरोक्त अन्य लोगों की पत्नियों ने अपने पति के घर रहना पसंद किया क्योंकि उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति बेहतर थी।
एक स्त्री का मूल्य, सम्मान अथवा महत्त्व परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में पति की नजरों में ज्यादा था। राजगृह के सेट्ठी गहपति की पत्नी को जब जीवक ने स्वस्थ किया तो पुत्र, पुत्रवधू एवं स्वयं उस स्त्री ने वैद्य को कृतज्ञतावश चार-चार हजार सिक्के दिए लेकिन अकेले उसके पति ने चार हजार सिक्के, एक दास-दासी एवं गाड़ी प्रदान किया। (विनयपिटक, पृष्ठ 272) एक दूसरा उदाहरण है जब सेट्ठी गहपति का पुत्र बीमार हुआ तो वैद्य जीवक ने शल्यक्रिया के मौके पर केवल पत्नी की उपस्थिति की अनुमति प्रदान की। (विनयपिटक, पृष्ठ 276)
हमें पति-पत्नी के बीच के झगड़ों के उदाहरण भी मिलते हैं। एक पत्नी, जो अब भिक्षुणी बन चुकी है, अपने पति को इस बात के लिए कोसती है कि वह उससे पहले जैसी सेवाएं नहीं लेता। (विनयपिटक, पृष्ठ 263) एक ब्राह्मण की पत्नी जिसकी कई बेटियां हैं, अपने पति को सुबह-सुबह पैर से जगाती है। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 170) एक बूढ़ा ब्राह्मण एक तरुणी से शादी करता है और जोरू का गुलाम बन जाता है। वह शिशु के जन्म के अवसर पर पत्नी को भेंट के रूप में एक पालतू बन्दर देने का वादा करता है। शिशु के जन्म से पहले ही पत्नी को अपना उपहार मिल जाता है। पति को मूर्ख बनाने की नीयत से पत्नी उस बन्दर को रंगाई-धुलाई के लिए रंगरेज के पास भेज देती है। मज्झिमनिकाय, पृष्ठ 384-385)
निश्चित रूप से कुछ पत्नियां पतिव्रता नहीं हैं। एक पत्नी अपने पति की गैर-मौजूदगी में प्रेमी से गर्भवती हो जाती है तथा गर्भपात के लिए बौद्ध भिक्षु से दवाइयां प्राप्त करती है। (विनयपिटक, पृष्ठ 83) एक लिच्छवी पुरुष लिच्छवी गण से अपनी व्यभिचारिणी पत्नी की हत्या के लिए परामर्श मांगता है। (विनयपिटक, पृष्ठ 225)
सिगालोवाद सुत्त में कहा गया है कि एक पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी को मान-सम्मान और भरोसा दे। बदले में पत्नी को चाहिए कि वह पतिव्रता बने और पति की संपत्ति की रक्षा करनेवाली हो। (दीघनिकाय, पृष्ठ 190)
एक अन्य प्रसंग में बुद्ध प्रौढ़ाओं को अपने-अपने पति के घर जाने का संदेश देते हैं। वे कहते हैं-(1) एक पत्नी अपने पति से पहले जागती है और बाद में काम से मुक्त होती है। वह हर्ष के साथ अपने पति के काम में हाथ बंटाती है, उसकी इच्छा की पूर्ति करती है और भद्रता के साथ संभाषण करती है। (2) पति के प्रत्येक सम्माननीय अर्थात् माता-पिता, श्रमण एवं ब्राह्मण का वह सम्मान करती है। (3) वह सारा घर संभालती है और उसमें निवास करनेवाले लोग यथा दूत, दास एवं घरेलू नौकरों के भोजन का प्रबंध करती है। वह स्वस्थ एवं अस्वस्थ-सभी की तीमारदारी करती है। (4) वह अपने पति की गृहस्थी में दक्ष है तथा उसे मालूम है कि कौन-सा काम कैसे करना है। (5) वह अपने पति की संपत्ति, रुपया, अनाज, सोना-चांदी आदि की हिफाजत करती है। वह डकैत अथवा अपव्ययी नहीं है। केवल ऐसी ही पत्नियां मृत्यु के बाद ‘देव’ के रूप में पुनर्जन्म ले सकती है। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 36-38)
अन्यत्र बुद्ध, अनाथपिंडिक की धनी परिवार से आई उच्छृंखल पुत्रवधू सुजाता को सलाह देते हैं। वे उसे पत्नी की सात कोटियों के बारे में विस्तार से बताते हैं। ‘वधक’ प्रथम श्रेणी की पत्नी है जो निर्दयी और भ्रष्ट है, जो रात में अपने पति की उपेक्षा करती है और अपना समय गैर-मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाने में व्यतीत करती है। दूसरी श्रेणी की पत्नी अपने पति का सारा माल-असवाब लूट ले जाती है। तीसरी श्रेणी की पत्नी नौकरानियों जैसी सुस्त, खर्चीली एवं बातूनी होती है। ये तीन तरह की पत्नियां भरोसे के लायक नहीं होतीं तथा मृत्यु के बाद नरक में वास करती हैं। लेकिन चौथी श्रेणी की पत्नी माता के समान (मातु समा) होती है और अपने पति के प्रति सहानुभूति रखती है तथा संपत्ति की रक्षा करती है। पांचवीं श्रेणी की पत्नी बहन-तुल्य (भगिनी समा) होती है और अपने पति को एक ज्येष्ठ आदमी का सम्मान प्रदान करती है। छठवीं श्रेणी की पत्नी सखा समान होती है तथा जो अपने पति को देखकर आनंद से भर जाती है। वह पतिव्रता और पति की विश्वासी होती है। सातवीं श्रेणी की पत्नी दासी समान होती है। वह धैर्य धारण करनेवाली एवं आज्ञाकारिणी होती है। ऐसी पत्नियां पति से मार खाने का भय नहीं पालती। बुद्ध की नजरों में इन तीनों श्रेणी की पत्नियां स्वर्ग जाती हैं। बुद्ध की इस व्याख्या के बाद सुजाता ‘दासी समा’ पत्नी बनने की चाह व्यक्त करती है। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 92-93)
लड़की विवाहोपरांत एक अजनबी परिवार में जाती है। इस नये घर में सास, ससुर एवं घरेलू नौकरों के मध्य वह काफी डरी-सहमी रहती है। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 78) विनयपिटक (पृष्ठ 120) में परिवार में स्त्रियों की कई कोटियां निर्धारित हैं। प्रथम श्रेणी में घर की बड़ी-बूढ़ियां हैं। दूसरी श्रेणी में घर की बेटियां हैं एवं तीसरी श्रेणी में छोटी उम्र की बच्चियां हैं। चौथी श्रेणी में घर की बहुएं एवं पांचवीं तथा अंतिम श्रेणी में दासियां हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 120) रेखांकित करने योग्य बात है कि बहुओं को परिवार की महिलाओं में सबसे अंत में रखा गया है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उनकी गिनती बाहरी सदस्य अर्थात् दासी से ठीक पहले हुई है। लगता है कि इन दासियों को परिवार के सदस्यों में केवल इसलिए शामिल कर लिया गया कि ये घर में साथ-साथ रहती हैं। तनिक आश्चर्य की बात नहीं है कि बहू के साथ कभी-कभी दासी-सा व्यवहार किया जाता है। एक वेश्या की बेटी जिसकी शादी एक सम्मानित परिवार में हुई, कुछ ही महीनों तक बहू के रूप में रही लेकिन बाद में उसकी स्थिति ठीक दासी की हो गई। (विनयपिटक, पृष्ठ 136-37) उसी कहानी में हम यह उल्लेख भी पाते हैं कि कुछ बहुएं पति एवं उनके माता-पिता से संतुष्ट हैं जबकि अन्य नहीं। (विनयपिटक, पृष्ठ 137) इस बात में संदेह नहीं कि पुत्रवधू परिवार की एक सदस्य है। गहपति मेंडक के कुटुम्ब की सूची में उनकी पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू, दास एवं घरेलू नौकर शामिल हैं। (विनयपिटक, पृष्ठ 240-41) मेंडक की पत्नी के चंगा होने पर वैद्य जीवक को जिनलोगों ने उपहार दिए उनमें उनकी पुत्रवधू भी शामिल है। सास एवं पति की भांति उसने भी चार हजार सिक्के जीवक को प्रदान किए थे। (विनयपिटक, पृष्ठ 273)
आदर्श व्यवहार में पुत्रवधू से अपेक्षा की जाती थी कि वह अपनी जगह से उठकर पति एवं उनके माता-पिता को आसन एवं जल प्रदान करे। (अंगुत्तरनिकाय, पृष्ठ 37) पुत्री के जन्म के अवसर पर दुखी पसेनदि को बुद्ध सांत्वना देते हैं कि शादी के बाद उनकी पुत्री अपनी सास का उचित सम्मान करेगी। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 86) सास को यहां ‘सासुदेवा’ कहा गया है। किंतु व्यवहार में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। सुदिन्न जब भिक्षु बनने की घोषणा करते हैं तो यह उनकी मां ही जो उन्हें बहलाने-फुसलाने का यत्न करती है न कि पत्नी। यह भी कि सुदिन्न को भिक्षु बनने के लिए माता-पिता ही की अनुमति की दरकार है न कि पत्नी की। पुनः जब वे घर लौटते हैं तो उसकी पत्नी नहीं बल्कि मां ही उनसे अनुनय-विनय करती है कि वह पुत्र के रूप में परिवार को एक उत्तराधिकारी दे। पत्नी अपने पति से मिले, उसका स्वागत करे इसकी भी अनुमति मां ही प्रदान करती है। यहां हम पुत्रवधू को एक निष्क्रिय भूमिका में पाते हैं। (विनयपिटक, प्प्प् पृष्ठ 13-18) वह महज एक माध्यम भर साबित होती है।
पुत्रवधू प्रायः सास-ससुर एवं पति की आज्ञाकारिणी एवं मान-सम्मान देनेवाली ही नहीं साबित होती। एक बार भिक्षु उदायि किसी के घर जाते हैं, (विनयपिटक, पृष्ठ 20-21) जहां सास दरवाजे पर बैठी मिलती है जबकि पुत्रवधू अपने अंदर के कमरे में। भिक्षु पहले सास को फिर पुत्रवधू को अलग-अलग एवं गोपनीय तरीके से धम्म का उपदेश देते हैं। फलस्वरूप दोनों स्त्री एक-दूसरी को भिक्षु उदायि की प्रेमिका मान बैठती है। पहले सास ने पुत्रवधू से सीधा सवाल किया, ‘बोलो, भिक्षु ने क्या कहा ?’ पुत्रवधू ने माकूल जवाब दिया और बदले में सास से सवाल कर बैठी। दोनों के उत्तर एक समान थे। दोनों ने इस शक के लिए भिक्षु को जिम्मेवार ठहराया। (विनयपिटक, प्ट पृष्ठ 20-21; यह बात ध्यान देने की है कि सास अपनी वधू के लिए थोड़ी झिझक के साथ ‘जे’ संबोधन का प्रयोग करती है जो अन्यत्र दासों के लिए प्रयुक्त है। देखें, एन. वाग्ले, सोसायटी ऐट द टाइम ऑफ द बुद्ध, पृष्ठ 179, पा.टि. 140) यहां हम पाते हैं कि चूंकि सास को उच्च सामाजिक हैसियत प्राप्त है इसलिए पहले उसे ही धम्म का उपदेश मिलता है तथा पहले वही अपनी शंका प्रकट करती है।
बुद्ध जब अनाथपिंडिक के यहां गये तो काफी हो-हल्ला सुनने को मिला। इस शोर का कारण सुजाता थी। वह एक बड़े घराने से थी। (विनयपिटक, पृष्ठ 92-93) बुद्ध को बताया गया कि वह पति, उसके माता-पिता एवं स्वयं बुद्ध तक को सम्मान की नजर से नहीं देखती। अनाथपिंडिक ने बुद्ध से प्रार्थना की कि वे उसे शिक्षा दें। बुद्ध की शिक्षा के बाद वह ‘दासी समा’ पत्नी बनती है और सबकी सेवा करना प्रारंभ करती है। फटे-चीटे वस्त्र में लिपटे एक ब्राह्मण ने बुद्ध से शिकायत की उनके बेटों ने बहुओं के साथ मिलिभगत करके उन्हें दरवाजे का रास्ता दिखा दिया है। (संयुत्तनिकाय, पृष्ठ 176) स्पष्ट है कि बहुओं ने सास-ससुर पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था।
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