भाषा के बारे में मार्क्सवादी चिंतन है कि ‘इसका निर्माण पूरे समाज के
हितसाधन के लिए लोगों के पारस्परिक सम्पर्क-सूत्र के रूप में समाज के सभी सदस्यों
के लिए हुआ है। पूरे समाज की एक भाषा होती है जो समाज के हर सदस्य का हितसाधन बिना
उसकी वर्गीय स्थिति को ध्यान में रखे हुए करती है।’1 खासकर स्तालिनवादी मार्क्सवाद
को माननेवाले लोगों की यह मान्यता है कि भाषा विचारधारा से मुक्त होती है,2 लेकिन वास्तव में भाषा
विचारधारा से न केवल गहरे स्तर पर जुड़ी होती है बल्कि यह उस विचार के वर्चस्व का
साधन बन जाती है।3 भारतीय समाज के जीवनानुभव इस बात को काफी हद तक पुष्ट करते हैं। प्राचीन
भारतीय समाज में4 वर्णों के आधार पर भाषा-विधान प्रसिद्ध है।5 तत्कालीन साहित्य के अध्ययन से
निश्चित पता लगता है कि जातियों/वर्णों के अनुसार भाषा-विधान तथा व्यवहार प्रचलित
था।6 शायद
इसीलिए शताब्दियों तक साहित्य-जगत में प्राकृत को वह मान्यता और प्रतिष्ठा न मिली
जो संस्कृत को प्राप्त थी, उल्टे उसका निरंतर तिरस्कार होता रहा। जिस किसी ने
प्राकृत का व्याकरण बनाया, उसने प्राकृत को भाषा समझकर व्याकरण नहीं लिखा।7 जबकि भाषावैज्ञानिक
तथ्य है कि ‘भाषाएं न तो अच्छी होती हैं न बुरी; वे महज भिन्न होती हैं।8
प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मण अथवा श्रेष्ठ लोग संस्कृत का प्रयोग करते थे
जबकि अन्य लोग प्राकृत।9 साधारण जन प्राकृत बोलते थे, परंतु संस्कृत वाक्यों का भाव
अवश्य समझ लेते थे। संस्कृत-नाटकों में विविध प्राकृतों के प्रयोग की प्रणाली से
यह स्पष्ट विदित होता है।10 मार्कण्डेय के ग्रंथ में कोहल11 का मत है कि यह प्राकृत
राक्षसों, भिक्षुओं, क्षपणकों, दासों आदि द्वारा बोली जाती है।12 नाट्यशास्त्र और साहित्यदर्पण में
बताया गया है कि राजाओं के अंतःपुर में रहनेवाले आदमियों द्वारा मागधी व्यवहार में
लाई जाती है। दशरूप का भी यही मत है। साहित्यदर्पण के अनुसार मागधी
नपुंसकों, किरातों, बौनों, म्लेच्छों, आभीरों, शकारों, कुबड़ों आदि द्वारा बोली जाती है। नाट्यशास्त्र तक में बताया गया है कि
मागधी नपुंसकों, स्नातकों और प्रतिहारियों13 द्वारा बोली जाती है। दशरूप में वर्णित है कि पिशाच
और नीच जातियां मागधी बोलती हैं और सरस्वतीकण्ठाभरण का मत है कि नीच स्थिति
के लोग मागधी प्राकृत काम में लाते हैं। मृच्छकटिक में शकार, उसका सेवक स्थावरक,
मालिश करनेवाला जो
बाद को भिक्षु बन जाता है; बसन्तसेना का नौकर कुम्भीलक वर्द्धमानक जो चारुदत्त का सेवक
है, दोनों
चाण्डाल, रोहसेन
और चारुदत्त14 का छोटा लड़का मागधी में बात करते हैं। शकुन्तला नाटक में पृष्ठ 113 और उसके बाद, दोनों प्रहरी और धीवर,
पृष्ठ 154 और उसके बाद शकुन्तला
का छोटा बेटा सर्वदमन इस प्राकृत में वार्तालाप करते हैं। प्रबोधचन्द्रोदय
के पृष्ठ 28 से 32 के भीतर चार्वाक का चेला और उड़ीसा से आया हुआ दूत, पृष्ठ 46 से 64 के भीतर दिगम्बर जैन मागधी
बोलते हैं। मृच्छकटिक के पृष्ठ 29 से 39 तक में जुआघर का मालिक और उसके साथ जुआरी जिस बोली
में बातचीत करते हैं, वह ढक्की है।15
कहना होगा कि प्राकृत केवल जैन या बौद्ध सम्प्रदाय (पालि के रूप में) की भाषा
न थी। यह बात अलग है कि जैन सूत्रों में हमें शुद्ध प्राकृत के नमूने मिलते हैं।16 प्राकृत भील, कोल, शबर, दस्यु, चाण्डाल आदि से लेकर राजदरबार
और रनिवासों तक में यह भाषा बोली जाती थी। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे
अव्युत्पन्न (अनगढ़, ग्राम्य) जनभाषा कहा है।17 संस्कृत चूंकि शिष्ट जनों की भाषा थी इसलिए उसे
सर्वश्रेष्ठ आसन प्रदान किया गया। अकारण नहीं है कि कई विद्वान प्राकृतों को
कृत्रिम कहते हैं और संस्कृत को इसका मूल बताते हैं। इसके प्रमाण में मार्कण्डेय,
चण्ड तथा हेमचन्द्र
आदि की ‘प्रकृतिः
संस्कृतम्’ उक्ति उद्धृत की जाती है।18 किंतु आज प्राकृत
का मूल संस्कृत को बताना वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है अथवा कहें कि
भ्रमपूर्ण है।19
संस्कृत के वैयाकरणों ने शब्दकोशों की भी रचना की है। इसलिए व्याकरण ग्रंथों
की ही भांति शब्दकोश भी पुरानी लीक पर चलते नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, अपभ्रंश शब्द के लिए
व्याकरण का सबसे पहला प्रयोग है-‘अपशब्द’।अमरकोश, विश्वप्रकाश, मेदिनि, अनेकार्थसंग्रह,
विश्वलोचन,
शब्दरत्नसमन्वय तथा शब्दकल्पद्रुम
आदि कोशों में अपभ्रंश का अर्थ ‘अपशब्द’ एवं ‘भाषा विशेष’ भी मिलता है। मेदिनि तथा अन्य कोशों में भी दोनों
अर्थ मिलते हैं पर अमरकोश में केवल ‘अपशब्द’ अर्थ है।20 संस्कृत व्याकरणशास्त्र के
प्राचीन आचार्य व्याडि का मत उद्धृत करते हुए भर्तृहरि ने कहा है कि
‘शब्द
संस्कार से हीन शब्दों का नाम अपभ्रंश है’।21 संस्कृत वैयाकरण इस तथ्य से अनजान न थे कि भाषा का स्वभाव
ही अपभ्रंश है,22 पर वे ‘साधु भाषा’ के पक्षपाती थे। जो शब्द
शिष्टजनों के द्वारा व्यवहृत नहीं होता वह ‘अवाचक’ है, ऐसे ही अवाचक शब्द जब प्रसिद्ध
अथवा लोक प्रचलित हो जाते हैं तब वे अपभ्रंश हो जाते हैं।23 स्पष्ट है कि शिष्टजनों के
द्वारा प्रयुक्त न होने से तथा इसीलिए संस्कारहीन होने से अव्यवहारणीय शब्दावली को
अपभ्रंश कहते हैं। महाभाष्य में अपभ्रंश का उल्लेख तीन स्थलों पर तथा अपशब्द
का कई बार हुआ है।24 महर्षि पतंजलि का अपशब्द से अभिप्राय व्याकरण के नियमों से पतित शब्द
से है। प्रायः ‘म्लेच्छ’ लोग अपशब्दों का व्यवहार करते हैं इसलिए ब्राह्मणों को अपशब्दों का प्रयोग
नहीं करना चाहिए।25 महाभाष्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उस समय म्लेच्छ आदि आर्येतर
जातियां तथा निम्न सामाजिक हैसियत प्राप्त जातियां शब्दों को ‘बिगाड़कर’ सहज प्रवृत्ति के अनुसार
उनका उच्चारण करती थीं। शिष्ट भाषा के आग्रही वैयाकरणों/सिद्धांतकारों ने जब देखा
होगा कि नीची जातियां भी एक शब्द के लिए कई ‘अप्रसिद्ध’ तथा शब्दानुशासन से हीन
शब्दों का व्यवहार करती हैं तो उसे आर्य जाति और भाषा से गिरा हुआ, अपभ्रष्ट तथा अपभ्रंश
कहा होगा। वैयाकरण इस बात से भलीभांति परिचित थे कि समाज में अपशब्दों का प्रचलन
अधिक है और ‘शब्दों’ का व्यवहार कम है। पतंजलि हमें स्पष्ट बताते हैं कि प्रत्येक शब्द के
कई ‘अशुद्ध’
रूप होते हैं। इन
अशुद्ध रूपों को आपने अपभ्रंश कहा है। उदाहरण के बतौर उन्होंने ‘गौ’ शब्द को लिया
है जिसके अपभ्रंश रूप ‘गावी’, ‘गोणी’,
‘गोता’ और ‘गोपोतालिका’ दिये हैं।26 कहना होगा कि ये रूप विभिन्न प्राकृतों
में बनते हैं।27 संस्कृत वैयाकरण जहां शिष्टों के प्रयोग से हीन भाषा को अपभ्रंश कहते हैं
वहीं साहित्यशास्त्री अश्लील तथा ग्राम्यपदों को सदोष मानते हैं और काव्य में उनका
निषेध करते हैं। कहा तो यह भी गया है कि देशी शब्दों से भरी प्राकृत कविता के सामने
संस्कृत की कौन सुनता है28 और राजशेखर ने, जिसकी प्राकृत उसकी संस्कृत के
समान ही स्वतंत्र और उद्भट है, प्राकृत को मीठी और संस्कृत को कठोर कह डाला।29
स्पष्ट ही निम्नवर्गीय लोगों के शब्द-प्रयोग सुनने में बुरे लगते हैं और
संभवतः इसीलिए वे काव्य में अनुचित माने जाते हैं। भोज ने भी कहा है कि लोक
को छोड़कर और कहीं ग्राम्य प्रयोग नहीं चलते। अश्लील, अमंगल और घृणासूचक शब्दों को
ग्राम्य कहते हैं।30 प्रसंगवश, राजपूताने के कवि और कविता जानने वाले ब्रजभाषा की सुकुमार कविता को तो ‘पिंगल’ कहते हैं और कर्कश शब्द
प्रचुर देशी कविता को ‘डिंगल’। राजपूताने की प्राचीन कविता जिसमें देशी अपभ्रंश अधिक आते
हैं और कर्कश शब्दों का अधिक प्रयोग होता है, ‘डिंगल’ कहलाती है। ‘पिंगल’ तो छंद के आचार्य हैं,
यह नहीं कि ‘डिंगल’ कविता के छंद कोई दूसरे
हैं, किंतु
‘डिंगल’
के छंद ‘पिंगल’ सूत्रों में लिखे छंदों
में अंतर्भूत हो जाते हैं, किंतु व्यवहार में श्रृंगार का दोहा जिसकी भाषा सुकुमार हो ‘पिंगल’ कहलाएगा और दानस्तुति,
निंदा (भूंडा) या
वीरता का देशी दोहा ‘डिंगल’।31
ग्राम्यभाषा के प्रति शिष्टजनों की जो घृणा है, उसको शूद्र, कायस्थ आदि शब्दों के
व्युत्पत्यर्थ निकालने के प्रयासों से भी समझा जा सकता है। सबसे पहले वेदांत
सूत्र में बादरायण ने इस दिशा में पहल की थी। इसमें शूद्र शब्द को दो
भाग में विभक्त कर दिया गया है-‘शुक’ (शोक) और ‘द्र’ जो ‘द्रु’ धातु से बना है और जिसका अर्थ बताया गया है दौड़ना।32 इसकी टीका करते हुए शंकर
ने तीन वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की है। पाणिनि के व्याकरण में उणादिसूत्र
के लेखक ने भी इस शब्द की कुछ ऐसी ही व्युत्पत्ति दर्शायी है। उशना ने
कायस्थों को एक जाति माना है और इसके नाम की एक विचित्र व्युत्पत्ति उपस्थित की है,
यथा काक (कौआ) के ‘का’, यम के ‘य’ एवं स्थपति के ‘स्थ’ शब्दों से ‘कायस्थ’ बना है; ‘काक’, ‘यम’ एवं ‘स्थपति’ शब्द क्रम से लालच (लोभ),
क्रूरता एवं लूट
के परिचायक हैं।33 व्यासस्मृति में कायस्थ नाइयों, कुम्हारों आदि शूद्रों के साथ
परिगणित हुए हैं।34 सुमन्तु ने लेखक (कायस्थ) का भोजन तेलियों आदि के समान माना है और
ब्राह्मणों के लिए अयोग्य समझा है। बृहस्पति (स्मृतिचन्द्रिका के व्यवहार में
उद्धृत) गणक एवं लेखक को दो व्यक्तियों के रूप में माना है और उन्हें द्विज कहा
है। ‘लेखक’
कायस्थ जाति का
द्योतक है कि नहीं, यह नहीं प्रकट हो पाता। मृच्छकटिक (नवां अंक) में श्रेष्ठी एवं कायस्थ
न्यायाधीश से समन्वित रखे गये हैं। लगता है, बृहस्पति का ‘लेखक’ शब्द कायस्थ का ही
द्योतक है। ईसा की आरंभिक शताब्दियों में कायस्थ शब्द राजकर्मचारी के रूप में
प्रयुक्त होता रहा है। किन्तु देश के कुछ भागों में, जैसाकि उशना एवं व्यास के कथन
में व्यक्त है, कायस्थों की एक विशिष्ट जाति भी थी।35 ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत व्युत्पत्ति में
शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है तथा उसे औचित्य प्रदान करने की
कोशिश की गई है। उसे ‘पतित’ बताया गया है। मनुष्यों में शूद्र36 एवं भाषाओं में अपभ्रंश समान रूप से ‘घृणित’ एवं ‘पतित’ हैं।
प्राचीन भारतीय समाज में शूद्रों के प्रति घृणा को चरम अभिव्यक्ति मिली मनुस्मृति
में। हालांकि शूद्रों की सामाजिक स्थिति के बारे में मनु के नियम बहुत हद तक
पुराने विधि-निर्माताओं के विचारों की पुनरुक्ति लगते हैं।37 कुछ नये नियम भी बनाये हैं।
उन्होंने सृष्टि-रचना की पुरानी कथा दुहराई है, जिसमें शूद्र का स्थान सबसे नीचे
है।38 मनु
ने चारों वर्णों के प्रति किये जानेवाले परस्पर अभिवादन की रीति की निर्धारक
विधियों को भी दुहराया है।39 किंतु उन्होंने यह भी बताया है कि जो ब्राह्मण सही ढंग से
अभिवादन का उत्तर नहीं दे उसे विद्वत्जन कभी अभिवादन नहीं करे, क्योंकि वह शूद्र के
समान है।40 पतंजलि बताते हैं कि अभिवादन का उत्तर देने में शूद्रों के संबोधन का
ढंग गैर शूद्रों से भिन्न था। शूद्रों का सम्बोधित करने का स्वर तेज नहीं होना
चाहिए। यदि कोई शूद्र (और अक्सर वैश्य के लिए भी) अपने मालिक की तरफ आंख उठाकर देख
लेता था या उसके सामने अपमानजनक तरीके से कुछ कह देता था, तो इस अपराध के लिए भारी दंड का
प्रावधान था। अधीनता से इनकार करना उस समय सबसे ज्यादा असह्य था। कुछ स्मृतियों
में तो शूद्रों द्वारा अपने मालिकों के प्रति उपयोग में लाये जानेवाले आदरसूचक
शब्दों तक का प्रावधान कर दिया गया था ताकि भाषा के माध्यम से उनके भीतर नीचता की
आत्मस्वीकृति का संस्कार पैदा किया जा सके।41 यदि शूद्र अपने मालिक के प्रति
अभद्र भाषा का प्रयोग करे तो उसकी जीभ तक काट लेने की सजा दी जा सकती थी। शूद्रों
को अक्सर द्वेषी, हिंसक, आत्मप्रशंसक, तुनकमिजाज, असत्यभाषी, अति लालची, कृतघ्न, विपथगामी, आलसी, प्रमादी और अशुद्ध आदि बतलाया गया है।42 वशिष्ठ धर्मसूत्र 43 कहता है: ‘एक व्यक्ति को जानना
चाहिए कि झूठ बोलना, ब्राह्मणों को दुर्वचन कहना, चुगली करना, निर्दयता, ईष्र्या आदि शूद्रों की विशेषताएं हैं।’ अछूतों और चांडालों को
विशेष तौर पर अशुद्ध, अविश्वासी, असत्यभाषी, चोर, दया
के पात्र, क्रोधी और लालची बताया गया है। उन्हें निरर्थक झगड़े-फसादों में लगे रहनेवाला
बताया गया है।44
शूद्र को वेदाध्ययन45 करने का आदेश नहीं था। इस बात पर बहुत-से स्मृतिकारों एवं
निबन्धों ने वैदिक वचन उद्धृत किये हैं। एक श्रुतिवाक्य है-‘विधाता ने गायत्री छन्द से
ब्राह्मण को निर्मित किया, त्रिष्टुप् छन्द से राजन्य (क्षत्रिय) को, जगती छन्द से वैश्य को,
किन्तु उसने शूद्र
को किसी भी छन्द से निर्मित नहीं किया, अतः शूद्र संस्कार के लिए अयोग्य है।46 शूद्र वैदिक क्रियाएं
नहीं कर सकते थे। वे देवताओं को ‘नमः’ शब्द के साथ संबोधन कर ध्यान कर सकते थे। वे ‘अग्नये स्वाहा’ नहीं कह सकते थे। मनु के
अनुसार उनके सारे क्रिया-संस्कार बिना वैदिक मंत्रों के हो सकते हैं। कुछ लोगों के
मतानुसार शूद्र वैवाहिक अग्नि नहीं रख सकते थे,47 किन्तु मेधातिथि, मिताक्षरा48 एवं मदनपारिजात 49 का कहना है कि वे
साधारण अग्नि में आहुति दे सकते हैं, विधिवत् उत्पन्न वैवाहिक अग्नि में नहीं। सभी लोग,
यहां तक कि शूद्र
एवं चाण्डाल 13 अक्षरों वाला राम-मन्त्र (श्री राम जय राम जय जय राम) एवं 5 अक्षरों वाला
शिव-मन्त्र (नमः शिवाय) उच्चारित कर सकते थे, किन्तु द्विजाति लोग 6 अक्षरों वाला
शिव-मन्त्र (ऊँ नमः शिवाय) कह सकते थे।50 इस संबंध में शूद्रकमलाकर 51 देखा जा सकता है,
जहां पांचरात्र मत
से विष्णुमन्त्र एवं शिव, सूर्य, शक्ति तथा विनायक के मंत्र कहे जाने का विधान है।52 लघुविष्णु का कहना है
कि शूद्र सर्वसंस्कारों से वर्जित जाति है। मनु के अनुसार शूद्र लोग बिना
मन्त्रोच्चारण के द्विजातियों द्वारा किये जानेवाले सभी धार्मिक कृत्य कर सकते
हैं।53 शंख
एवं यम के अनुसार बिना मन्त्रोच्चारण के शूद्रों के लिए संस्कार किये जा सकते हैं।
व्यास ने शूद्रों के लिए बिना मन्त्रोच्चारण के दस (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चैल, कर्णवेध एवं विवाह)
संस्कारों के विषय में विधान लिखा है। यही बात कुछ कम संस्कारों के लिए गौतम ने भी
कही है।54
मनु के अनुसार, यदि शूद्र जान-बूझकर वेदपाठ सुनता है तो उसके कानों में पिघले हुए सीसे अथवा
लाख से भर दिया जायेगा। यदि वह वैदिक मंत्रों का पाठ करता है तो उसकी जीभ काट डाली
जायेगी। यदि वह इन मंत्रों को कंठस्थ करता है तो उसके शरीर को बीच से चीर दिया
जायेगा। यदि वह बैठने, सोने, बातचीत करने अथवा सड़क पर टहलने में द्विजों की बराबरी करता
है तो उसे शारीरिक दंड दिया जायेगा।55 इतना ही नहीं, नाट्यशास्त्र में मंचस्थ नीच पात्रों
का चित्रण करते हुए उनके लिए भिन्न प्रकार के पद-संचार और अंग-संचार का विधान किया
गया है। इस विधान के अनुसार ऐसे पात्रों के शरीर का कोई भाग या माथा या हाथ अथवा
पांव झुका रहना चाहिए और उनकी नजर विभिन्न वस्तुओं पर फिरती रहनी चाहिए।56 ऐसी भंगिमाओं से उनमें
आत्मबल का अभाव झलकता है और यह सिद्ध होता है कि उन्हें अपने प्रभुओं के समक्ष सिर
ऊपर उठाने की गुस्ताखी नहीं करने दी जाती थी।57
धर्मसूत्रों में वर्ण के अनुसार वंदना और अभिवादन58 के जो विधान निर्धारित किये गये
हैं,59
उनसे स्पष्ट होता है कि शूद्र कितने पराधीन थे। आपस्तंब में बताया गया है
कि ब्राह्मण को अपनी दाहिनी बांह को अपने कान के समानांतर, क्षत्रिय उसे अपनी छाती के स्तर
तक, वैश्य
अपनी कमर तक, और शूद्र उसे अपने पांव की सीध में रखकर अभिवादन करना चाहिए और दोनों हाथ
जुड़े होने चाहिए।60 ब्राह्मणों के लिए यह नियम था कि वे क्षत्रियों एवं वैश्यों को अभिवादन न
करें। भले ही वे लोग विद्वान् एवं श्रद्धास्पद हों, केवल ‘स्वस्ति’ का उच्चारण पर्याप्त है।
बराबर-जाति वालों में ही अभिवादन होता है। ऐसा न करने पर अर्थात् यदि ब्राह्मण
क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र को अभिवादन करें, तो उन्हें क्रम से एक, दो या तीन दिनों का उपवास रखकर
प्रायश्चित करना पड़ता था।61 उच्च वर्ण के लोग नीचे वर्ण के लोगों को अभिवादन नहीं
करते।62 आपस्तंब
धर्मसूत्र 63 में कहा है-प्रथम तीन वर्णों के अभिवादन के प्रत्यभिवाद64 में अभिवादनकर्ता के
नाम का अंतिम अक्षर तीन मात्रा तक (प्लुत) बढ़ा दिया जाता है।65 यदि प्रणाम के उत्तर
में वे प्लुत न बोलेंगे तो उन्हें स्त्रियों की तरह प्रणाम किया जायेगा।66 इससे भिन्न वसिष्ठ का
नियम है। मनु के अनुसार ब्राह्मण को इस प्रकार प्रत्यभिवाद देना चाहिए-‘हे भद्र, आप दीर्घजीवी हों’,
और नाम का अंतिम
स्वर प्लुत कर देना चाहिए, किन्तु यदि नाम का अंतिम अक्षर व्यंजन हो तो उसके पूर्व का
स्वर प्लुत कर देना चाहिए। यही बात पाणिनि में भी पायी जाती है। महाभाष्य
ने इसकी टिप्पणी की है और दो वार्तिकों द्वारा बतलाया है कि यह नियम स्त्रियों के
प्रति लागू नहीं है, और क्षत्रिय एवं वैश्य के लिए विकल्प से लागू हो सकता है।67 विभिन्न वर्णों के
लोगों के कुशल-क्षेम और स्वास्थ्य68 के संबंध में जिज्ञासा प्रकट करने के लिए भिन्न-भिन्न शब्द
निर्धारित किये गये हैं।69 गौतम के मत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जाति के अतिथ्यिों का क्रम
से ‘कुशल’,
‘अनामय’ एवं ‘आरोग्य’ शब्दों से स्वागत करना
चाहिए।70
शूद्रों से भी आरोग्य कहना चाहिए।71 आपस्तंब एवं मनु का कहना है कि किसी ब्राह्मण से भेंट होने
पर ‘कुशल’
शब्द से स्वास्थ्य
के विषय में पूछना चाहिए।72 इसी प्रकार क्षत्रिय के स्वास्थ्य की जिज्ञासा के लिए ‘अनामय’, वैश्य से ‘क्षेम’ और शूद्र के लिए ‘आरोग्य’ शब्द का व्यवहार ही
विधिसम्मत है।73 जो बड़ा हो, उसे प्रणाम मिलना चाहिए, जो समान या छोटी अवस्था का हो उसका कुशल मात्र पूछना चाहिए।74 यह भी बताया गया है कि
किसी क्षत्रिय अथवा वैश्य का अभिवादन करने में लोगों को केवल सर्वनाम का प्रयोग
करना चाहिए, न कि उसके नाम का।75 इसका अर्थ हुआ कि केवल शूद्र को ही उसके नाम से संबोधित
किया जा सकता था। नाट्यशास्त्र में कहा गया है कि दासी-दासों, शिल्पियों और यांत्रिकों
के साथ बातचीत करने में उन्हें आज्ञावचक शब्दों से संबोधित किया जाना चाहिए।76 इससे यह सूचित होता है
कि निम्न जाति के लोग अनादरपूर्वक संबोधित किए जाते थे। मृच्छकटिक नाटक में
अधम वर्ग के लोगों के संबोधन में ‘दासी के बेटे’, ‘रखैल के बेटे’, ‘जार के बेटे’ आदि गालियों का प्रयोग
किया गया है।77 इनमें से कुछ गालियां, जैसे ‘छिण्णालिया पुत्त’ बिहार में आज भी प्रचलित है।78 संबोधन की दृष्टि से द्विज
वर्णों की स्थिति बहुत अच्छी मानी जा सकती है। प्राचीन पालि ग्रंथों में निम्न
वर्ग/वर्ण के लोगों ने किसी क्षत्रिय को उसके नाम से या उत्तम पुरुष में संबोधित
नहीं किया है।79 राजा उदय को गंगामाल हजाम पारिवारिक नाम से संबोधित करता है, इस पर उसकी मां बड़े रोष
के साथ कहती है: ‘इस नीच नापितपुत्र को इतना भी ज्ञान नहीं है कि वह मेरे बेटे को, जो पृथ्वी का मालिक है
और क्षत्रिय जाति का है, ब्रह्मदत्त कहकर पुकारता है।’80
मनु ने बच्चों के नामकरण संस्कार तक में वर्ण-विभेद का ध्यान रखा है, जिससे स्वभावतया शूद्रों
की हीनता झलकती है।81 मनु ने गृह्यसूत्रों के जटिल नियमों का परित्याग कर नामकरण के दो सरल नियम
दिये हैं। सभी वर्णों के नाम शुभसूचक, शक्तिबोधक, शान्तिदायक होने चाहिए। ब्राह्मणों एवं अन्य वर्णों
के नाम के साथ एक उपपद होना चाहिए, जिससे शर्म (प्रसन्नता), रक्षा, पुष्टि एवं प्रेष्य का संकेत
मिले।82
उनका स्पष्ट मत है कि ब्राह्मण का नाम मंगलसूचक, क्षत्रिय का नाम बलसूचक, वैश्य का नाम धनसूचक और
शूद्र का नाम निंदासूचक होना चाहिए।83 इसी के अनुपूरक के तौर पर उन्होंने बताया है कि
चारों वर्णों की उपाधि क्रमशः सुखवाचक (शर्मा), सुरक्षावाचक (वर्मा), समुन्नत्तिवाचक (भूति)
और सेवावाचक (दास) होनी चाहिए।84 कुल्लूक ने टीका की है कि ये उपाधियां क्रमशः
शर्मन्, वर्मन्,
भूति और दास होनी
चाहिए। विष्णुस्मृति स्पष्ट निर्देश देती है कि ब्राह्मणों के लिए जो नाम
चुना जाये वह शुभ होना चाहिए। क्षत्रियों के संदर्भ में वह शक्ति को स्पष्ट
करनेवाला; वैश्यों के संदर्भ में धन को दर्शानेवाला और शूद्रों के संबंध में तिरस्कार
स्पष्ट करनेवाला होना चाहिए। इतना ही नहीं, ब्राह्मण के उपनाम से समृद्धि,
क्षत्रियों से
रक्षा, वैश्यों
से संपत्ति एवं शूद्रों से सेवा-भावना झलकनी चाहिए। पारस्कर को छोड़कर किसी
अन्य गृह्यसूत्र में ब्राह्मणों या अन्य लोगों के नामों के आगे शर्मा आदि का जोड़ा
जाना नहीं लिखा गया है।85 महाभाष्य में इन्द्रवर्मा, इन्द्रपालित आदि नाम मिलते हैं,
जिनमें प्रथम
राजन्य अर्थात् क्षत्रिय का तथा दूसरा वैश्य का है। यम के अनुसार ब्राह्मणों की
नामोपाधि शर्मा या देव, क्षत्रिय की वर्मा या त्रात, वैश्य की भूति या दत्त तथा शूद्र
की दास है।86 किन्तु इस नियम का पालन सदा पाया नहीं गया। तालगुण्ड अभिलेख में कदम्ब वंश का
संस्थापक ब्राह्मण था और उसका नाम था मयूर शर्मा, किन्तु उनके वंशजों ने
क्षत्रियों की भांति वर्मा नामोपाधि धारण की थी।87 शूद्रों का ही उपनाम दास होना
चाहिए,88
इस नियम का अनुसरण शायद गुप्तकाल में नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ, रविकीर्ति नामक ब्राह्मण
के एक पूर्वज का नाम वराहदास था,89 और चंद्रगुप्त द्वितीय के सामंत सनकानीको के एक शासक का
नाम महाराज विष्णुदास था।90 नाट्यशास्त्र में कहा गया है कि नाटक में
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के नाम अपने गोत्र और कर्म के सूचक, वणिकों के नाम उनकी
उदारता के सूचक और सेवकों के नाम विभिन्न पुष्पों के सूचक होने चाहिए।91
हालांकि इसके यथेष्ट प्रमाण नहीं मिलते कि यह परिपाटी व्यापक रूप से प्रचलित
थी,92
किंतु नामों के संबंध में बनाये मनु के नियमों से जान पड़ता है कि निम्न वर्ण के
लोग प्राचीन भारतीय समाज में घृणा के पात्र थे। शूद्र के लिए प्रयुक्त ‘वृषल’ शब्द अपमानजनक माना-समझा
जाता था। पाणिनि के समास संबंधी नियम का उदाहरण देते हुए पतंजलि ने
बताया है कि ‘दासी के सदृश (दास्याः सदृशः) और वृषली के सदृश (वृषल्याः सदृश)’ पद गाली हैं।93 वृषल को चोर की कोटि
में रखा गया था और ब्राह्मण-शासित समाज इसके प्रति वैर-भाव रखता और प्रदर्शित करता
था।94 यह
जानकारी भी मिलती है कि वृषल, दस्यु और चोर घृणा के पात्र माने-समझे जाते थे।95
संक्षेप में, कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में वैयाकरणों, कोशकारों, नाटककारों एवं
साहित्यालोचकों का भाषा-चिंतन वर्ण/वर्ग-भेद जनित नियमों एवं आग्रहों का शिकार है।
प्राकृतों के प्रति घृणा,96 शूद्रों के प्रति ब्राह्मणों/क्षत्रियों की घृणा97 से समझ में आ सकती है।
इस दृष्टि से प्राचीन भारतीय भाषा-चिंतन को देखा-पढ़ा जाना चाहिए। प्राचीन भारतीय
समाज की एक सही और समग्र तस्वीर के लिए भी ऐसा करना लाभप्रद हो सकेगा।
संदर्भ एवं टिप्पणियां :
1. जोसेफ स्तालिन, मार्क्सवाद और भाषाविज्ञान की समस्याएं, परिकल्पना प्रकाशन, द्वितीय (संशोधित) हिंदी संस्करण,
लखनऊ,
2002, पृष्ठ 13.
2. मैनेजर पांडेय, ‘अश्लीलता के बहाने नारी के प्रश्न पर विचार’, हंस, नवंबर-दिसंबर 1994, पृष्ठ 29.
3. वही.
4.
शूद्र के लिए यज्ञ
में प्रयुक्त संबोधन से स्पष्ट है कि उत्तर वैदिक काल तक शूद्र आर्यों की भाषा
समझते थे। (शतपथ ब्राह्मण, प्. 1.4.11-12।) इस संबंध में महाभारत की एक अनुश्रुति
महत्त्वपूर्ण है: ‘ब्रह्मा ने वेद के प्रतीकस्वरूप सरस्वती का निर्माण पहले चारों वर्णों के लिए
किया, किंतु
शूद्र धनलिप्सा में पड़कर अज्ञानांधकार में डूब गए और वेद के प्रति उनका अधिकार
जाता रहा। (महाभारत, शांति पर्व, 181.15, ‘वर्णश्चत्वारः ऐते हि येषां ब्राह्मी सरस्वती, विहिता ब्रह्मणा पूर्वा
लोभात्वज्ञानतां गतः’।) वेबर की दृष्टि में इस कंडिका से यह ध्वनित होता है कि प्राचीन युग में
शूद्र आर्यों की भाषा बोलते थे। वेबर: इंडिश स्टुडियेन, II. पाद टिप्पणी 94, शूद्रों का प्राचीन
इतिहास, पृष्ठ 27 पर उद्धृत।
5. डा. देवेन्द्रकुमार शास्त्री, भविसयत्तकहा तथा अपभ्रंश कथाकाव्य, भारतीय ज्ञानपीठ,
दिल्ली,
1970, पृष्ठ 18.
6. वही. जाति/वर्ण सिर्फ भाषा ही को नहीं निर्धारित करते बल्कि कला माध्यमों को
भी गहरे तक प्रभावित करते हैं। बिहार के मिथिला क्षेत्र में बने कोहबर के
चित्रों-रेखांकनों से इसे आसानी से समझा जा सकता है. ‘ब्राह्मण परिवारों में ये चित्र महीन रेखांकनों और
संवेदनात्मक ऊर्जा से युक्त रहते हैं. कायस्थ परिवारों में हलके रंगों का प्रयोग होता है. इनके यहां गेरू, हलका भूरा, काला और कभी-कभी निस्तेज
लाल रंग का प्रयोग किया जाता है. रंगों की अपेक्षा इनके चित्रांकन में सधी और स्पष्ट रेखाएं
होती हैं.’ देखें, श्यामसुंदर दुबे, ‘मधुबनी लोक चित्रकला : जीवन संवेदना के रंग’,
आजकल : जून 2007, पृष्ठ 8.
7. नामवर सिंह/विश्वनाथ
त्रिपाठी (संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 11.
8. Languages are not better or worse; only different’. डैविड क्रिस्टल,
लिंग्विस्टिक्स,
पेंगुइन, प्रथम संस्करण : 1971, पुनर्मुद्रण: 1980,पृष्ठ 72.
9. ‘संस्कृत नाटकों की प्राकृत को शुद्ध प्राकृत का नमूना नहीं मानना चाहिए। वह
पंडिताऊ या नकली या गढ़ी हुई प्राकृत है, जो संस्कृत में मसविदा बनाकर प्राकृत-व्याकरण के
नियमों से त की जगह य और क्ष की जगह ख रखकर, साँचे पर जमा कर, गढ़ी गई है। वह
संस्कृत-मुहाविरों का नियमानुसार किया हुआ रूपान्तर है, प्राकृत भाषा नहीं।’ देखें, नामवर सिंह/विश्वनाथ
त्रिपाठी (संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 11.
10. उदयनारायण तिवारी,
भोजपुरी भाषा
और साहित्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, द्वितीय परिवर्द्धित संस्करण: 1984, पटना, पृष्ठ 41.
11. ‘राक्षसभिक्षुक्षपणक चेटाद्या मागधीं प्राहुः’ इति कोहलः।
12. अश्वघोष के नाटकों में तीन प्रकार की प्राकृत का प्रयोग हुआ है (1.) दुष्ट की भाषा,
(2.) गणिका एवं
विदूषक की भाषा और (3.) गोभम की भाषा. दुष्ट के मुख में नाटककार ने जो भाषा रखी है, उसमें प्राचीन मागधी की
सभी विशेषताएं हैं.
गणिका एवं विदूषक की बोली शौरसेनी के सदृश है. पालि से इसकी समानता स्पष्ट है. गोभम् द्वारा प्रयुक्त प्राकृत
को लूडर्स महोदय ने अर्धमागधी का प्राचीन रूप माना है. देखें, उदयनारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य,
बिहार राष्ट्रभाषा
परिषद्, पटना,
पृष्ठ 39-40.
13. औपस्थायिक (भरत नाट्यशास्त्र) निमुण्डाः का क्या अर्थ है, यह अस्पष्ट है.
14. यह बात स्टेंत्सलर की भूमिका के पृष्ठ 5 और गौडबोले के ग्रंथ पृष्ठ 493 में पृथ्वीधर ने बताई
है. इन संस्करणों में वह
शौरसेनी बोलता है; किंतु हस्तलिखित प्रतियों में इन स्थानों में सर्वत्र मागधी का प्रयोग किया
गया है. देखें, आर. पिशेल्, प्राकृत भाषाओं का
व्याकरण, (हिंदी अनुवाद), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पृष्ठ 46.
15.
पृथ्वीधर का मत है
कि शाकारी, चाण्डाली और शाबरी के साथ-साथ ढक्की भी अपभ्रंश की बोलियों में से एक है.
16. नामवर सिंह/विश्वनाथ त्रिपाठी
(संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 10.
17. अव्युत्पादितप्रकृतेस्तज्जनप्रयोज्यत्वात् प्राकृतमिति केचित्। नाट्यशास्त्र
की विवृति, अभिनवगुप्त।
18. प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र भवं प्राकृतम् उच्यते।-मार्कण्डेयः प्राकृतसर्वस्व,
1,1। प्रकृतेः
संस्कृताद् आगतं प्राकृतम्। वाग्भटालंकार की सिंहदेवगणिन् कृत टीका, 2, 2,। प्रकृतेरागतं
प्राकृतम्। प्रकृतिः संस्कृतम्।-धनिकः दशरूपक की टीका, 2, 90। प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र
भवत्वात् प्राकृतं स्मृतम्। प्राकृत चन्द्रिका, पीटर्सन की तीसरी रिपोर्ट से।
प्रकृतेः संस्कृतायास्तु विकृतिः प्राकृती मता।-नरसिंहः प्राकृत शब्द प्रदीपिका।
प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र भवं तत आगतं वा प्राकृतम्। हेमचन्द्रः
सिद्धहेमशब्दानुशासन, 1, 1। प्रकृतस्य तु सर्वम् एव संस्कृतम् यानिः। कर्पूरमंजरी,
वासुदेवकृत
संजीविनी टीका। सिद्धं प्राकृतं त्रेधा। सिद्धं प्रसिद्धं प्राकृतं त्रेधा भवति।
संस्कृतं योनिः। तच्चेदं-मात्रा, मत्ता। नित्यं, णिच्चं इत्यादि।-चण्ड; प्राकृतप्रकाश, सटिप्पण हस्तलिखित ग्रंथ
से।
19. इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए देखें, आर. पिशेल्, पूर्वोद्धृत.
20. एम. एस. कत्रे, प्राकृत लैंग्वेज एंड देयर कंट्रिव्युशन टु इंडियन कल्चर,
पृष्ठ 22.
21.
शब्द संस्कारहीनो
यो गौरिति प्रयुयुक्षिते। तमपभ्रंशमिच्छन्ति विशिष्टार्थनिवेशिनम्। वाक्यपदीय,
ब्रह्मकांड,
148.
22. डा. देवेन्द्रकुमार
शास्त्री, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 16.
23.
पारम्पर्यादपभ्रंशा
विगुणेष्वभिधातृषु। प्रसिद्धिमागता येषु तेषां साधुरवाचकः।।-वही, 154.
24. वैसे अपभ्रंश शब्द का
व्यवहार व्याकरण एवं नाट्यशास्त्र के ग्रंथों में प्रथम शताब्दी में किया जाने लगा
था। ईसा पूर्व दूसरी शती में महाभाष्यकार पतंजलि ने ‘अपाणिनीय’ प्रयोगों के लिए अपभ्रंश शब्द का
व्यवहार किया है। महाभाष्यकार ने इस शब्द का प्रयोग किसी भाषा विशेष के अर्थ में
नहीं किया। भाषा के अर्थ में अपभ्रंश शब्द का व्यवहार ईसा की छठी शताब्दी से
प्रारंभ हुआ। देखें, उदयनारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्,
पटना, पृष्ठ 48.
25. तेऽसुरा हेलयो हेलय इति
कुर्वन्तः पराबभूवुः। तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छित वै नापभाषित वै, म्लेच्छो हव एष
यदपशब्दः।-महाभाष्य। अपशब्दत्वं व्याकरणानुगतशब्दस्येषद्..... एव प्रसिद्धिमिति
भावः। वही।
26.
भूयांसोऽपशब्दाः,
अल्पीयांसः शब्दा
इति। एकैकस्य ही शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः। तद्यथा गौरित्यस्य शब्दस्य गावी गौणी गोता
गोपोतलिकेत्यादयो बहवोऽपभ्रंशाः।
27. उदयनारायण तिवारी, भोजपुरी भाषा और साहित्य, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्,
पटना, पृष्ठ 48.
28.
‘ललिए महुरक्खरए
जुबईयणवल्लहे ससिंगारे। सन्ते पाइयकव्वे को सक्कइ सक्कयं पढि़उं।।’ (ललित मधुराक्षर, युवतीजनबल्लभ, सशृंगार प्राकृत कविता
के होते हुए संस्कृत कौन पढ़ सकता है ?) -बज्जालग्ग, 29; नामवर सिंह/विश्वनाथ त्रिपाठी
(संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 11, पादटिप्पणी संख्या 1 में उद्धृत.
29. ‘परुसा सक्कअबन्धा पाउअबन्धो वि होइ सुअमारो।’ देखें, नामवर सिंह/विश्वनाथ त्रिपाठी
(संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 11, पादटिप्पणी संख्या 2 में उद्धृत.
30.
अश्लीलामङगलघृणावदर्थ
गाम्यमुच्यते।-सरस्वतीकण्ठाभरण, 1, 144.
31. नामवर सिंह/विश्वनाथ त्रिपाठी (संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी:
प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997, दूसरी आवृत्ति: 2006, पृष्ठ 12.
32. वेदांत सूत्र, 1. 3. 34 ‘शुगस्य तदनादर श्रवणात तदाद्रवणत्ः सूच्यते।
33.
काकाल्लौल्यं
यमात् क्रौर्य स्थपतेरय कृन्तनम्। आद्यक्षराणि संगृह्य कायस्थ इति निर्दिशेत्।।
उशना 35।
34. व्यासस्मृति 1/10-11
35.
पाण्डुरंग वामन
काणे, धर्मशास्त्र
का इतिहास (अनुवाद: अर्जुन चैबे काश्यप), प्रथम भाग, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, चतुर्थ संस्करण: 1992, पृष्ठ 128.
36. रैक्व ने जानश्रुति को ‘शूद्र’ कहा जो गाली के अर्थ में प्रयुक्त है। देखें, एम. विंटरनित्ज, हिस्ट्री आफ इंडियन
लिटरेचर, वाल्यूम-1, पृष्ठ 212, पादटिप्पणी संख्या-3.
37.
रामशरण शर्मा,
शूद्रों का
प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1995, पृष्ठ...।
38.
मनुस्मृति,
1. 31.
39.
वही, 2.
127.
40. वही, 2. 126.
41.
भगवतशरण उपाध्याय,
खून के छींटे
इतिहास के पन्नों पर, पी. पी. एच., नई दिल्ली, पृष्ठ 116.
42. एस. जी. सरदेसाई,
प्राचीन भारत
में प्रगति एवं रूढि़, पी. पी. एच., जयपुर, 1987, पृष्ठ 72.
43. अध्याय 6, श्लोक 24.
44. एस. जी. सरदेसाई, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 72.
45. वेदाध्ययन के मामले में
धर्मसूत्रों एवं मनु में उच्च वर्ण की नारियों को भी शूद्र की श्रेणी में रखा गया
है. वे आश्रित मानी जाती
थीं (गौतम, 18.1, वशिष्ठधर्मसूत्र, 6.1, बौधायनधर्मसूत्र, 2.2.45, मनु 9.3 आदि) विवाह को छोड़कर स्त्रियों
के अन्य सभी संस्कारों में वेद-मंत्रों का उच्चारण नहीं होता था. जैमिनि (6.1.17-21) ने वैदिक यज्ञों में
पति-पत्नी को साथ तो रखा है किन्तु मंत्रोच्चारण पति ही करता है. जैमिनि ने दोनों को बराबर नहीं
माना है. शबर ने अपनी व्याख्या
में स्पष्ट किया है कि पति विद्वान होता है और पत्नी विद्याहीन. मेधातिथि ने मनु (2.49) की व्याख्या में एक
मनोरंजक प्रश्न उठाया है कि ब्रह्मचारी लोग भिक्षा मांगते समय स्त्रियों से ‘भवति भिक्षां देहि’
वाला संस्कृत
सूत्र क्यों बोलते हैं, जबकि वे यह भाषा नहीं जानतीं ? धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 249.
46. गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यं न केनचिच्छन्दसा
शूद्रमित्यसंस्कार्यो विज्ञायते। वसिष्ठ 4/3, अपरार्क द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 23; अपरार्क ने यम को भी इस
प्रकार उद्धृत किया है ‘न केनचित्समसृजछन्दसा तं प्रजापतिः।’ काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 162,
पाद टिप्पणी
संख्या 59
में उद्धृत.
47.
मनु 3/67 एवं याज्ञ.1/97.
48. याज्ञवल्क्य 1/131.
49.
मदनपारिजात,
पृष्ठ 31.
50. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 163.
51. पृष्ठ 30-31, जिसमें वराह, वामन एवं भविष्यपुराण के
वाक्य उद्धृत हैं.
52. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 164.
53. मनु 10/127.
54. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 164.
55. मनुस्मृति, 12. 4-7; देखें, प्राचीन भारत में प्रगति एवं रूढि़, पृष्ठ 213.
56. नाट्यशास्त्र, XII. 146-8, ...नीचादि चेटादिनाम्।
57. आर.एस. शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, पृष्ठ 242.
58. अभिवादन तीन प्रकार का होता है; नित्य (प्रतिदिन के लिए आवश्यक), नैमित्तिक (विशिष्ट
अवसरों पर ही करने योग्य) एवं काम्य (किसी विशिष्ट काम या अभिकांक्षा से प्रेरित
होने पर किया जानेवाला)। देखें, धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 237.
59. कुछ लोग नमस्कार की जगह ‘नमस्ते’ कहते हैं। स्वामी दयानन्द की ‘नमस्ते’ की रूढि़ के जमने के पहले ‘सलामवालेकम्’, ‘वालेकमस्सलाम’ देखादेखी राजा
जयकृष्णदास आदि के चलाए ‘परमात्मा जयति’, ‘जयति परमात्मा’ का रहा था। देखें, नामवर सिंह/विश्वनाथ
त्रिपाठी (संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 7.
60. दक्षिणं बाहु श्रोत्रसमं प्रसार्य ब्राह्मणोऽभिवादयीतीरःसमं राजन्यो मध्यसमं
वैश्यो नीचैः शूद्रः प्रांजलि। आपस्तंब धर्मसूत्र, 1. 2. 5. 16-17; देखिए संस्कारप्रकाश,
पृष्ठ 454;
और देखिए, धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 238,
पाद टिप्पणी
संख्या 65.
61. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 238.
62. वही, प्रथम
भाग, पृष्ठ
239.
63.
आपस्तंब
धर्मसूत्र 1/2/5/18.
64. प्रणाम पाने पर गुरु या कोई व्यक्ति जो प्रत्युत्तर देता है या जो आशीर्वचन
कहता है उसे ही प्रत्यभिवाद कहा जाता है। देखें धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 238.
65. आपस्तंब धर्मसूत्र, प्रश्न-1, पटल-2, खंड-5, सूत्र-17.
66.
नामवर
सिंह/विश्वनाथ त्रिपाठी (संपा.), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: प्रतिनिधि संकलन,
नेशनल बुक ट्रस्ट,
इंडिया, पहला संस्करण: 1997,
दूसरी आवृत्ति: 2006,
पृष्ठ 15.
67. प्रत्यभिवादेऽशूद्रे। पाणिनि 8/2/83; यदि अभिवादन करनेवाला ब्राह्मण हो (जैसाकि ‘अभिवादये देवदत्तोऽहं
भोः’ में
पाया जाता है) तो प्रत्यभिवाद होगा-‘आयुष्मानेधि देवदत्ता 3’ (यहां 3 से तात्पर्य है प्लुत, अर्थात् तीन मात्रा तक). यदि नाम
व्यंजनान्त हो तो प्रत्यभिवाद होगा-‘आयुष्मानभव सोमशर्मा 3 न्.’ यदि स्त्री अभिवादन करे, यथा ‘अभिवादये गाग्र्यहं भोः’
तब प्रत्यभिवाद
होगा ‘आयुष्मती
भव गार्गि’ (अर्थात् यहां प्लुत नहीं है). यदि इन्द्रवर्मा नामक क्षत्रिय अभिवादन करे तो
प्रत्यभिवाद होगा ‘आयुष्मानेधीन्द्रवर्मा 3 न्,’ या ‘आयुष्मानेधीन्द्रवर्मन्’. यदि वैश्य इन्द्रपालित अभिवादन करे तो प्रत्यभिवाद होगा ‘आयुष्मानेधीन्द्रवर्मापालिता
3, या
धीन्द्रपालित.’ यदि शूद्र तुषजक अभिवादन करे तो प्रत्यभिवाद होगा ‘आयुष्मानेधि सुषजक’ (अर्थात् यहां प्लुत नहीं
है). देखें, धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 238-39, पाद टिप्पणी संख्या 66. 68. हरदत्त के अनुसार चारों
वर्णों के लिए ऐसे स्वास्थ्य-संबंधी प्रश्न होने चाहिए-अपि कुशलं भवतः, अप्यनष्टपशुधनोसि,
अप्यरोगो भवान्। ‘कुशलानामयारोग्याणामनुप्रश्नः।
अन्त्यं शूद्रस्य।’ गौतम (5/37-38); इस पर हरदत्त का कहना है कि ‘अपि कुशलमायुष्मन्निति ब्राह्मणः प्रष्टव्यः, अप्यनामयम् अत्रभवत इति
क्षत्रियः, अप्यरोगो भवानिति वैश्यः, अप्यरोगोऽसीति शूद्रः।’ देखें, धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 240,
पाद टिप्पणी
संख्या 68.
69.
ऐसी परिपाटी आधुनिक
काल में भी देखी गई. स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जैसाकि लिखा है, ‘ब्राह्मण ही परस्पर एक
दूसरे को नमस्कार करते हैं और दूसरे लोग प्रणाम ही करते हैं परंतु यदि अन्य जाति
नमस्कार शब्द का प्रयोग कर देवे तो देगा मच जावे. हालांकि दोनों के अर्थ में कुछ
भी भेद नहीं है. परंतु सांकेतिक भेद मान लिया गया है.’ देखें, ब्रह्मर्षि वंश विस्तर की भूमिका,
पृष्ठ 19;
‘भो’ शब्द का प्रयोग राजन्य
या वैश्य के संबोधन में किया जाता था, शूद्र के संबोधन में नहीं. (भो राजन्य विशां वा)
पतंजलि ऑन पाणिनीज ग्रामर, 8. 2.
82-83.
70. गौतम 5/37-38.
71
मनु 2/127; धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 410.
72. वही, पृष्ठ 239.
73.
आपस्तंब
धर्मसूत्र, 1. 4. 14. 26-29; गौतम धर्मसूत्र 5. 41-42; धर्मशास्त्र का इतिहास,
प्रथम भाग,
पृष्ठ 239.
74. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 239-40.
75. आपस्तंब धर्मसूत्र, 1. 4. 14. 23, ‘सर्वनाम्ना स्त्रियो
राजन्यवैश्यो च न नाम्ना।’
76. नाट्यशास्त्र, XVII. 73.
77. मृच्छकटिक, अंक 1, पृष्ठ 5, अंक 2, पृष्ठ 63-64.
78. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन
इतिहास, पृष्ठ 269, पाद टिप्पणी 296.
79. फिक, दि सोशल और्गेनाइजेशन ऑफ नौर्थ ईस्टर्न इंडिया, पृष्ठ 83.
80. जातक, 3, पृष्ठ 452.
81. मनुस्मृति, 2. 31. ‘शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्।’ और, ‘दोनों बहिनें उसे कात्यूशा कहकर
बुलातीं। यह नाम इतना परिष्कृत नहीं था जितना कि कातेन्का, पर साथ ही इतना भद्दा भी नहीं था
जितना कि कात्का।’ देखें, लेव तोलस्तोय, पुनरुत्थान (हिंदी अनुवाद), प्रगति प्रकाशन मास्को, 1977, पृष्ठ 14-15। ‘बिल्लेसुर नाम का शुद्ध रूप बड़े पते से मालूम
हुआ-विल्वेश्वर है।’ देखें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, बिल्लेसुर बकरिहा, पृष्ठ 1. पंकज कुमार चैधरी की कविता ‘श्राद्ध का भोज’ भी द्रष्टव्य है जिसमें
गांव के सवर्ण एवं अवर्ण लोगों के लिए अलग-अलग संबोधनों का प्रयोग है। गांव के
सवर्ण अरबिन्द के लिए ‘अरबिन्द बाबू’ और ‘राजा भाईजी’ जैसे संबोधनों का प्रयोग है जबकि अवर्ण पात्रों के नाम ‘अकलूआ’, ‘चट्टूआ’, ‘बिसेसरा’ आदि हैं। भोज में
खाद्य-सामग्री परोसनेवाला एक ही व्यक्ति ‘अरबिन्द बाबू’ से पूछता है तो ‘सब्जी’ शब्द का प्रयोग करता है
जबकि अकलूआ, चट्टूआ, बिसेसरा से पूछते हुए ‘तरकारी’ शब्द से ही काम चला लेता है।
82.
धर्मशास्त्र का
इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 200.
83. प्राचीन भारत में कुत्तों तक के संबोधन में उच्चरित ‘अत्तु’ शब्द संस्कृत भाषा का ही है। यह
आदरार्थ प्रयुक्त है। अर्थात् आदर (सम्मान) में कहा गया शब्द जिसका भाषिक अर्थ है-‘आइए खाइए’। देखें, राजू रंजन प्रसाद,
‘संस्कृति और
इतिहास बोध’, प्रभात खबर, नई दिल्ली, 29 अगस्त 2004.
84. मनुस्मृति,
2. 32; मनुस्मृति,
2. 32 का संदर्भ
देखें, ‘शर्मवद्ब्राह्मणस्य
स्याद्राज्ञोरक्षासमन्वितम् वैश्यस्यपुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुक्तम्।’
मध्यकाल में भक्तिमार्ग के अधिकतर कवि जो सामाजिक रूप से निम्न वर्ण/वर्ग के लोगों
का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, अपने नाम के अंत में दास लगाते थे।
85. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 200.
86. ‘शर्म ब्राह्मणस्य वर्म
क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य।’ पारस्कर, 1.17। बौधायनगृह्यशेषसूत्र (1.11.10) में आया है-‘अथाप्युदाहरन्ति-शर्मान्तं
ब्राह्मणस्य, वर्मान्तं क्षत्रियस्य, गुप्तान्तं वैश्यस्य, भृत्यदासान्तं शूद्रस्य
दासान्तमेव वा।’ यम-शर्मा देवश्च विप्रस्य वर्मा त्राता च भूभुजः। भूतिर्दत्तश्च वैश्यस्य दासः
शूद्रस्य कारयेत्।। देखें, धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग, पृष्ठ 200.
87. वही, पृष्ठ 200.
88.
विष्णुपुराण,
XXVII. 6-9.
89. ‘कार्पस इंस्क्रिप्शनम इंडिकेरम’, III,
सं. 35 (समयांक 533-34 ई.), पंक्ति 9-12.
90. वही, सं. 3 (समयांक 401-2 ई.), पंक्ति 1-2.
91. नाट्यशास्त्र, XVII. 95-99.
92. डा. रामविलास शर्मा की राय में ‘अंग्रेजी राज में
जाति-प्रथा अधिक कठोर हुई, यह तो इसी बात से देखा जा सकता है कि व्यक्ति के नाम के साथ
उसकी जाति के नाम जोड़ने का सिलसिला जितने बड़े पैमाने पर उन्नीसवीं सदी में और
फिर बीसवीं सदी में देखा गया, उतने बड़े पैमाने पर ऐसा सिलसिला भारत में कभी था ही नहीं।
तीन-चार जातिवाचक शब्द शर्मा, भट्ट, मिश्र आदि संस्कृत ग्रंथों में पंडितों के नाम के साथ मिलते
हैं. लेकिन आधुनिक काल में
व्यक्ति के नाम के साथ पचासों नए जातिसूचक शब्द जोड़े जाने लगे.’ देखें, भारतीय इतिहास और
ऐतिहासिक भौतिकवाद, नई दिल्ली, पृष्ठ 47-48.
93.
पतंजलि ऑन पाणिनीज
ग्रामर, 6.2.2.
94. वही, 2. 2. 2 और 3. 2. 127.
95. वही, 5. 3. 36.
96. ‘हाल’ प्राकृत
साहित्य के उसी प्रकार पुरस्कत्र्ता थे जिस प्रकार विक्रमादित्य संस्कृत साहित्य
के. ब्राह्मण-साहित्य में अपने प्राकृत-प्रेम के कारण इन्हें कई बार उपहास का
पात्र बनना पड़ा है. गुणाढ्य को भी ऐसे ही उपहास का पात्र बनना पड़ा था. उनकी रचना
सुनकर एक राजा की टिप्पणी थी कि जिस पुस्तक की भाषा पैशाची हो उसकी कथा में
विचारने योग्य हो ही क्या सकता है-‘पैशाची वाग् मषी रक्तं मौनोन्मत्तश्च लेखकः।
इति राजाऽब्रवीत् का वा वस्तुसारविचारणा।।’ बृहत्कथामंजरी, 1. 87; डा. हजारीप्रसाद
द्विवेदी, हिन्दी-साहित्य का आदिकाल, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, चतुर्थ संस्करण, 1980, पृष्ठ 59-60।
97. इस घृणा को आधुनिकता के
नवोन्मेष के काल में बाबू रामदीन सिंह की ‘क्षत्रिय-पत्रिका’ के विज्ञापन में इस रूप में देखा
जा सकता है-‘धिक्कार है हमारे क्षत्रियत्व पर कि कायस्थ प्रभृति नीच वर्ग के बड़े-बड़े
स्थानों पर नियत होते हैं और हमारे बन्धु बान्धव प्यादगीरी कर केवल 3 या 4 मुद्रा में कालयापन
करते हैं।’ देखें, डाक्टर
धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, परिशिष्ट 2, पृष्ठ 325.