शाहाबाद जिले के मटुकपुर ग्राम के निवासी ब्रजविहारी लाल (जन्म 1844 ई.) की अंगरेजी राज के कर्मचारियों के बीच अच्छी प्रतिष्ठा थी। सन् 1857 ई. के गदर के बाद राजभक्त होने के कारण आपने दरबारी की प्रतिष्ठा प्राप्त की और महारानी विक्टोरिया की पहली जुबली (1) के दरबार (बांकीपुर, पटना) में निमंत्रित किये गये थे। (2) डुमरांव (शाहाबाद) के ठग मिश्र (जन्म : 1845 ई.) महाराज राधाप्रसाद सिंह के आश्रय में रहा करते थे। (3) आपके पिता पं. जानकी मिश्र भी डुमरांव के महाराज महेश्वरबख्श सिंह के दरबारी पंडित रह चुके थे। (4) कहते हैं, महाराज राधाप्रसाद सिंह के दरबार में ठग मिश्र का बड़ा सम्मान था। दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह जब लाट साहब से खिताब पाने के उपलक्ष्य में अपने दरबार में आनंदोत्सव मना रहे थे, आपने अपने आशुकवित्व-गुण का परिचय दिया था। इससे महाराज बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने आपको प्रचुर पुरस्कार प्रदान किया। (5) उस दरबार में आपने जो पंक्तियां पढ़ी थीं, वे इस प्रकार हैं-(क) ‘महाराज आये सब सोभा के समाज-युत,/डेरा कियो तितै जितै जाको मन भायो है।/दियो है खिताब लाट साहब जू पटना में,/राजन समाज ‘ठग’ मुख ते सुनायो है।/सोभा के समाज लैके पुर को पधारे जबै, तबही ते जाचकन रतन लुटायो है।/आनंद बधाई बाजै लक्ष्मीश्वरसिंहपुर, /मानों राजगद्दी माँह अवध सुहायो है।’ (6) (ख) ‘पाटलिपुत्र सुआइगो लाट त्यौं आनँदयुक्त बुलाइ नृपालन।/भाई भुपालन के सँग लै सुभ द्यौस मैं खिल्लत दै हियहालन।/तापै कहै नृप जाहु घरे ‘ठग’ नित्य हरो दुखिया-दुख जालन।/बिज्ञ सुजान तऊ उपदेस दै नीति सो राज करो तुम पालन।।’ (7) दरभंगा से आप गया जिले के मकसूदपुर के दरबार में पहुंचे। वहां के राजा ने आपको एक समस्या दी, जिसकी पूर्ति आपने बड़े ही अच्छे ढंग से की। इस पर राजा ने आपका सम्मान किया। इसी प्रकार अनेक वर्षों तक आप विभिन्न राज-दरबारों में भ्रमण करते और पुरस्कार प्राप्त करते रहे। (8)
राम कवि के जन्म (9) एवं स्थान का पता निश्चित रूप से नहीं चलता किन्तु इतना ज्ञात हुआ है कि सन् 1857 के सैनिक विद्रोह के अमर सेनानी जगदीशपुर निवासी बाबू कुँवरसिंह के आश्रित कवि थे। (10) आपने अपने आश्रयदाता बाबू कुँवरसिंह के शौर्य-पराक्रम पर काव्य-रचना भी की थी, जो आगे चलकर ‘कुँवर-पचासा’ (11) नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुई- ‘जैसे मृगराज गजराजन के झुण्डन पै/प्रबल प्रचण्ड सुण्ड खण्डत उदण्ड है।/जैसे बाज लपकि लपेट के लवान-दल/दलि-मलि डारत प्रचारत बिहंड है।/ कहै ‘राम’ कवि जैसे गरुड़ गरब गहि/अहि-कुल दण्डि-दण्डि मेटत घमण्ड है।/तैसे ही कुँवरसिंह कीरति अमर मण्डि/फौज फिरंगीन की करी सुखंड-खंड है।।’ (12)
गया के निवासी जगदेवनारायण सिंह टेकारी नरेश रामकृष्ण सिंह के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे। महाराज की मृत्यु (13) के बाद आपने निम्नलिखित कुछ दोहे बनाये, जिनसे आपके आशु-कवि होने का प्रमाण मिलता है-‘पक्ष लोक निधि चन्द्रयुत संवत कार्तिक मास।/सोमवार तिथि चार में कृष्ण मास शुभ कास।।/गये लोक साकेत में करि सबको आचेत।/पंच-रचित को त्याग करि ज्ञान-बिराग समेत।।/महाराज-पदवी सहित रामकृष्ण जिहि नाम।/कलिमल दल को दलि गये सिया-राम के धाम।। (14)
चंपारन जिले के छोटक पाठक बेतिया (चंपारन) के महाराज राजेन्द्र किशोर सिंह (1855-83) के दरबारी कवि थे। (15) आपकी रचनाओं के उदाहरण नहीं मिले। महाराज राजेन्द्रकिशोर काव्य एवं संगीत कला के पारखी थे। उनकी प्रसिद्धि उनकी दानशीलता के कारण भी थी। उन्होंने काशीनरेश महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह के दरबारी कवि ‘सरदार’ को दान देकर कई बार सम्मानित किया था। एक बार कविवर पजनेस को भी उनके एक कवित्त पर 20 हजार रुपये देकर प्रसन्न किया था। कहते हैं, भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के दुर्दिन में भी उन्होंने उनकी (भारतेन्दुजी की) सहायता की थी और राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द को भूमिदान दिया था। (16) राजेन्द्र किशोर सिंह का राज्यारोहण-काल सन् 1855 ई. है। दरबार में रहते समय छोटक पाठक की अवस्था कम से कम चालीस वर्ष की रही होगी। अतः अनुमान है कि आपका जन्म सन् 1815 ई. के लगभग हुआ होगा। (17)
चंपारन जिले के ही ‘बैकुंठवा’ ग्राम के निवासी हरिराज द्विवेदी (18) को बेतिया राज-दरबार से सम्मान प्राप्त हुआ था। (19) कहते हैं, पिउन्दीबाग (बेतिया) के शिव-मन्दिर पर जो प्रशस्ति अंकित है, उसके लेखक आप ही हैं। हिन्दी में आपने महारानी विक्टोरिया की प्रशस्ति लिखी थी। (20) महारानी विक्टोरिया की हीरक-जयन्ती सन् 1877 ई. में, बिहार में मनाई गई थी। उसी अवसर पर वह प्रशस्ति लिखी गई होगी। (21)
सारन जिले में सीवान सब-डिवीजन के ‘पतारि’ (आँदर परगना) के निवासी तोफाराय, पजनेस (22) के समकालीन थे। आपका संबंध हथुआ-बेतिया दरबारों के अतिरिक्त मझौली नरेश (गोरखपुर) के दरबार से भी था। आपने ‘मझौली-विवाह-वर्णन’ नामक एक कविता-पुस्तक लिखी थी, जिसमें राजवंश के एक विवाहोत्सव (23) का दृश्य वर्णित है।
मारकण्डेय लाल को 'समस्यापूर्ति' में दरभंगा जिले का निवासी बताया गया है। (24) आपका उपनाम ‘चिरजीवी’ था। सन् 1887 ई. में महारानी विक्टोरिया की जुबली के अवसर पर बनारस ‘कवि समाज’ ने ‘चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी’ की समस्या पूर्ति करवाई थी। आपकी पूर्ति से ही प्रसन्न होकर उक्त ‘कवि समाज’ ने आपको ‘चिरजीवी’ की उपाधि दे दी। (25) आपका दरभंगा-नरेश लक्ष्मीश्वर सिंह बड़ा सम्मान करते थे। उन्हीं के नाम पर आपने ‘लक्ष्मीश्वर-विनोद’ नामक काव्य-ग्रंथ की रचना की थी। (26) इसके अतिरिक्त आपने छत्रपति शिवाजी के संबंध में वीररसात्मक छंदों की भी रचना की थी। (27)
प्रसंगवश, ‘चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी’ के पूर्तिकारों में पण्डित अम्बिकादत्त व्यास भी थे। (28) इतना ही नहीं, व्यासजी ने मुजफ्फरपुर (बिहार) में सन् 1887 ई. में ‘भारत-सौभाग्य’ नामक नाटक की रचना की थी। उसी वर्ष यह पुस्तक खड्गविलास प्रेस से छपी। रामदीन सिंह ने महारानी विक्टोरिया की जुबिली के अवसर पर इसे मुद्रित कर निःशुल्क वितरित किया था। यह पुस्तक बड़ी अच्छी सुनहली किनारी तथा विभिन्न रंगों में छापी गई थी। विदेशी पत्रों ने इसकी बड़ी सराहना की थी। (29) यह नाटक ‘क्षत्रिय-पत्रिका’ के ‘प्रीति-स्वरूप’ वितरित किया गया उपहार था। चार दृश्यों और इक्यावन पृष्ठों का यह नाटक अंग्रेजी शासन के प्रति आस्था प्रकट करता है। (30) इन चार अंकों में दिखलाया गया है कि अंग्रेजी राज के पूर्व मुगलकाल में यवनों के दुराचार, मूर्खता, फूट आदि से भारत में दुर्भाग्य का साम्राज्य आ गया था। अंग्रेजी राज में शिक्षा, उत्साह, एकता, यन्त्रविद्या और शिल्प ने दुर्भाग्य को दूर कर दिया। (31)
श्रीनगर (पूर्णिया) के तत्कालीन राजासाहब श्री कमलानंद सिंह, अम्बिकादत्त व्यास के प्रिय शिष्यों में थे. अध्ययनोपरांत जब वे अपने राजकार्य में प्रवृत्त हुए, तब उन्होंने आपको अपनी राजधानी में बड़े आग्रह एवं आदर के साथ बुलाकर गजदान, स्वर्णदान और कौशेय वस्त्रदानपूर्वक सम्मानित किया था. इस सम्मान के उत्तर में आपने जो कुछ कहा था, वह कवित्तमय है : (क) ‘कीन्हों भलो मान सिरीनगर नरेसुर ने/देखिवे को भरिभरि गई चहुँधा मगै./वसन अभूषण अइबन है अंग अंग/संग दीनै चोबदार लखि हियरा पगै./ऊँचे गजराज पै चढ़ायेकै बिदाई दीन्हों/चलतै ‘सुकवि’ हिय संसय यहै जगै./मतिधों बघेला कै, बुंदेला कै चंदेला जानि,/कहूतै चहूँधा पै सलामी दगिबै लगै.’ (32) (ख) ‘तू जयसिंह सोहै महाराज बिहारी सो व्यास लस्यौ,/दूसरो तू छत्रसाल अहै ‘सुकवी’ तो सभा महँ लाल निहारो./श्री कमलानंद सिंह सुनो, जस आपको चारहू ओर पसारो/तू सिवराज अहै मिथिला को औ’ भूषण अम्बिकादत्त तिहारो/है गुनगाहक और गुनी इन दोउन दुर्लभ लोग कहै हैं./जो पै कहीं गुनगाहक होहिं तो आप गुनी तहँ खोजन जैहैं./भागन तैं ‘सुकवी’ को मिले तुम तोऊ हहा हम और लजैहैं./आप इतो गुन देखि दियो गुनगाहकता पै कहा हम दैहैं.’ (33)
दरभंगा जिले के ही ‘हासा’ (समस्तीपुर) ग्राम के वासी रामशरण उपाध्याय (जन्म: 1 जनवरी 1891 ई.) को 1936 ई. में तत्कालीन सरकार द्वारा ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किया गया था तथा ‘काॅरोनेशन-मेडल’ प्रदान किया गया था। (34) आपने लिखा था, ‘सम्राट पंचम जाॅर्ज के शासन-काल से बिहार-प्रान्त का बहुत ही गहरा सम्बन्ध है। बिहार का भूतकाल गौरवपूर्ण है। किसी समय में सारे भारतवर्ष के शासन का केन्द्र होने का श्रेय इसे प्राप्त था। किन्तु समय-चक्र के फेर से अंगरेजी शासन में आने के समय यह अपने पड़ोसी बंगाल प्रान्त के अन्तर्गत मान लिया गया था। फल यह हुआ कि लगभग डेढ़ सौ वर्षों तक इसके अस्तित्व का पता भी सुदूर देशों में बहुत कम लोगों को रह गया था। सन् 1911 ई. के 12 दिसम्बर को जब सम्राट पंचम जाॅर्ज ने सम्राज्ञी मेरी के साथ दिल्ली में विशेष दरबार कर अपनी भारतीय प्रजाओं के प्रति अपूर्व प्रेम का परिचय दिया, उन्होंने देश की भलाई के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उनमें एक के द्वारा बिहार को पुनः भारतवर्ष के अन्य प्रान्तों के मध्य स्वकीय शासन के द्वारा समकक्ष स्थान प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
उस समय बिहारियों के हृदय में कितना उत्साह तथा आनन्द हुआ, इसका वर्णन करना कठिन है। इतना ही नहीं, सम्राट ने उस समय की भारत-यात्रा में बिहार के कतिपय स्थानों में भ्रमण किया। बिहारवासी उस समय अपने श्रद्धेय सम्राट के दर्शनों से कृतार्थ हुए। (35)
सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘काॅरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ। (36) रामसकल पाठक ‘द्विजराज’ की कवित्व-शक्ति से तत्कालीन रीवाँ, डुमराँव और दरभंगा के नरेश बड़े प्रभावित थे। आपकी कविता से प्रसन्न होकर इन रियासतों के स्वामियों ने आपको पुरस्कृत किया था। (37)
संदर्भ एवं टिप्पणियां :
1. यह जुबली 1 जनवरी, सन् 1877 ई. को मनाई गई थी। देखें, ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 83, पादटिप्पणी 1
2. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 83
3. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 85
4. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 83
5. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 86
6. ‘आत्मचरित-चम्पू’, पृष्ठ 33; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 86
7. ‘आत्मचरित-चम्पू’, पृष्ठ 33-34; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 86
8. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 86
9. अनुमानतः आपका जन्म-काल सन् 1820 के आसपास माना जा सकता है। देखें ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 155, पा.टि. 2
10. ‘1857 के समवर्ती कवि और उनका काव्य’, ‘आज’ दैनिक, साप्ताहिक-विशेषांक, 9 फरवरी, सन् 1958 ई.; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 155, पा.टि. 2
11. इस नाम की एक पुस्तक भोजपुरी भाषा में तोफाराय नामक कवि की भी है। देखें, ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 155, पा.टि. 3
12. आज में प्रकाशित उक्त लेख से ही; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 155, पा.टि. 4
13. महाराज रामकृष्ण सिंह की मृत्यु सन् 1875 ई में 53 वर्ष की आयु में हुई थी। देखें ‘बिहार दर्पण’, पृष्ठ 140-41; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 128, पा.टि. 1
14. ‘बिहार दर्पण’, पृष्ठ 141; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 128
15. बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के द्वितीयाधिवेशन (बेतिया) के स्वागताध्यक्ष सेठ रामकृष्ण जी के भाषण से। साथ ही देखिए, ‘चंपारन की साहित्य साधना’, पृष्ठ 19; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 126।
16. ‘वार्षिकी’, सन् 1961-62 ई., पृष्ठ 49
17. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 126, पा.टि.3
18. अनुमानतः आपका जन्म 1837 ई. के लगभग हुआ होगा। देखें ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 179, पा.टि. 4
19. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 179
20. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 179
21. ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 179, पा.टि. 4
22. पजनेस के एक प्रसिद्ध कवित्त के लिए बेतिया के एक महाराज ने बीस हजार रुपये दिये थे। देखें ‘चंपारण की साहित्य-साधना’, पृष्ठ 18; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, द्वितीय खंड, पृष्ठ 179, पा.टि. 5
23. मझौली (गोरखपुर) के महाराज तेजमल्ल के पुत्र उदयमल्ल का विवाह डुमरांव (शाहाबाद) के महाराज महेश्वरबख्श सिंह के यहां हुआ था। देखें हिंदी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड, पृष्ठ 197, पा.टि. 6
24. समस्यापूर्ति, मासिक, मार्च, 1897 ई., पृष्ठ 1-2; हिंदी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड, पृष्ठ 274, पा.टि. 2
25. सम्मेलन पत्रिका, त्रैमासिक, भाग 45, संख्या 1, पौष-फाल्गुन, शक सं. 1880 वि., पृष्ठ 90; हिंदी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड, पृष्ठ 274, पा.टि. 1
26. हिंदी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड, पृष्ठ 274
27. हिंदी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड, पृष्ठ 275
28. डा. धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, पृष्ठ 210
29. वही, पृष्ठ 226
30. ‘कविजनवर्णित कीर्ति, भरतिभरणस्य भारम्/धन्या मान्या प्राज्ञी, राज्ञी विक्टोरिया नाम्नी।।1।।/विलसन्तु तत्करमलै, भारतसौभाग्यमेतदतिसुखदम्/भारतभूवास्तवैः, मा चिन्तां का´्चनाऽपिगमः।।2।।/भारतसौभाग्यतत्त्वं, मा चिन्तां का´्चनाऽपि गमः/सा लालयति यतस्त्वां, राज्ञी श्रीभारतेश्वरी देवी।।3।।-‘क्षत्रिय-पत्रिका’ सन्दर्भ-सम्पादकैः; डा. धीरेन्द्रनाथ सिंह, पूर्वोक्त, पृष्ठ 226 पर उद्धृत।
31. धीरेन्द्रनाथ सिंह, पूर्वोक्त, पृष्ठ 227
32. जयन्ती स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 478-79; हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 356, पाद टिप्पणी संख्या 1
33. वही.
34. हिंदी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 506
35. जयन्ती स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 713; हिंदी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 506
36. हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502
37. हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 510
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